कानपुर [शिवा अवस्थी]। Kanpur Cloth Market: कानपुर न्यारा है, अलमस्त है और हर कोने में अलग-अलग रंग वाला शहर है। चाहे वह कारोबार हो, किसी चकल्लस या खानपान से जुड़ी चीजें सबकी रंगत अलग दिखती है। वह भी यूं ही नहीं, अलग-अलग वजह भी हैं इसके पीछे। कभी लाल इमली, एल्गिन, स्वदेशी काटन, एनटीसी जैसी बड़ी-बड़ी मिलों में निर्मित कपड़ों के कारण देश-दुनिया तक यह शहर मशहूर रहा तो यहां वर्तमान में कपड़े समेत अन्य सामान के अनोखे बाजार भी हैं। हर गली खुद में कुछ न कुछ समेटे है।

किसी सड़क से भले आप रोज गुजरते होंगे, लेकिन उससे सटी अंदर जा रही हर गली में होने वाला कारोबार क्या है, उसका कहां तक जुड़ाव है, कितनों को रोजगार मिल रहा है, ये नहीं पता होगा। आइए, आज हम आपको रूबरू कराते हैं, ऐसे ही एक अनोखे कपड़ा बाजार से, जहां तौल (प्रतिकिलो) के भाव में कपड़े और साड़ियां बिकती हैं। यहां से थोक में खरीदारी कर इन्हें फुटकर में बेचकर शहर समेत आसपास के जिलों तक हजारों लोग रोजी-रोटी कमा रहे हैं।

जरीब चौकी चौराहा से अफीम कोठी जाते समय चंद्रिका देवी चौराहा से बायीं तरफ मुड़कर कोकलस मिल रोड होते हुए परेड चौराहा जाने पर रास्ते में मिलता है घनी आबादी वाला क्षेत्र तलाक महल। यहां की किसी भी गली में घुस जाइए तो आपको कपड़े का यह अनोखा और चौंकाने वाला बाजार मिल जाएगा। कपड़े की आलीशान दुकान, शोरूम और वहां रखा तराजू। खरीदार ने माल पसंद किया और तराजू पर तौलाई शुरू हो गई। कोई भी यह देखे तो एक बारगी चौंकना तय है, लेकिन यह है सोलह आना सच।

इस बाजार की बुनियाद करीब 50 साल पहले पड़ी थी। तब स्वर्गीय वसी अहमद मुंबई से कपड़े लाकर यहां बेचते थे। इसके बाद धीरे-धीरे लोग इससे जुड़ते चले गए और सूरत समेत अन्य शहरों से माल ज्यादा आने लगा। अब तौल में बिक्री की बात समझिए। तलाक महल के कारोबारी सलीम खां बताते हैं कि कपड़ा उद्योग में धागा तौल में आता है, जिससे पैंट-कमीज, साड़ियों समेत अन्य के बड़े-बड़े थान (कई मीटर कपड़े का सेट) तैयार होता है।

इसी तरह साड़ियां भी धागे से निर्मित होती हैं। इनके निर्माण में कई बार बचे टुकड़े, जिन्हें कटपीस कहते हैं और छोटी-छोटी खामियों वाली साड़ियां, दुपट्टे व अन्य कपड़े बड़े कारोबारी तौल में कम कीमत में बेचते हैं। इसी माल को वहां से खरीदकर यहां बेचने वाले बढ़े तो कानपुर में यह अनोखा बाजार सज गया।

एक बात और अलग है, इस बाजार की। ज्यादातर मोहल्लों में बाजार सुबह 10 से 11 बजे के आसपास खुलते हैं, लेकिन तलाक महल की तंग गलियों से लेकर छोटे मियां का हाता, बेबिस कंपाउंड, भैंसा हाता, दादा मियां का चौराहा, रेडीमेड बाजार, बेकनगंज बाजार, परेड मैदान के इर्द-गिर्द की गलियों में कहीं भी जाएंगे तो सुबह करीब सात बजे से ही यहां कतार में दुकानें खुलने की शुरुआत होती दिख जाएगी।

इस बाजार के ग्राहक आम खरीदार कम ही होते हैं, बल्कि शहर के लाल बंगला, कल्याणपुर, दबौली, बेकनगंज, बाबूपुरवा के साथ ही आसपास के जिलों फतेहपुर, उरई, जालौन, बाराबंकी, उन्नाव, फर्रुखाबाद, कन्नौज, हरदोई के साथ ही बुंदेलखंड के फुटकर कारोबारी माल खरीदते हैं।

दोपहर तक खरीदारी कर वह अपने शहर की दुकानों में माल लेकर पहुंचते हैं। इससे कम पैसे वाले भी इस कारोबार से जुड़कर आराम से परिवार चलाने भर की कमाई प्रतिमाह कर लेते हैं। इससे समाज के अल्प आय वर्ग के लोगों को पहनने के लिये बेहतर कपड़ा भी मिल जाता है।

किलो में खरीदारी, प्रति मीटर में फुटकर दुकानदार बेचते : छोटे मियां का हाता घनी बस्ती में तौल में कपड़ा बेचने वाले नूर अली कहते हैं, ज्यादातर व्यापारी सूरत, अहमदाबाद और मुंबई से थोक में कपड़ा मंगाते हैं। उनके यहां कानपुर के ही छोटे व्यापारियों की दुकानदारी ज्यादा है, इसलिए सुबह सात बजे से ही भीड़ लगने लगती है। यहां से किलो की कीमत पर कपड़ा लेकर दुकानदार दोपहर तक शहर की प्रमुख फुटकर बाजारों में अपनी दुकानों पर प्रति मीटर की दर से इसे बेचते हैं। इससे वह लोगों को सस्ती दर में कपड़ा देकर भी आय कर लेते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के कस्बों में स्थित बाजार के व्यापारी सस्ती दर में आकर्षित करने वाले काटन व रेशमी कपड़े बेचते हैं तो उन्हें फायदा होता है।

इस साल अजमेर उर्स में बिका पांच ट्रक कपड़ा : व्यापारी सलीम खां के मुताबिक, मेलों में दुकान लगाने या फेरी लगाकर कपड़ा बेचने वाले अधिकांश व्यापारी इस बाजार से तौल में कपड़ा लेते हैं। यहां से लेकर इस कपड़े को दूर-दूर तक लगने वाले मेलों व बाजारों में बेचते हैं। इस साल अजमेर उर्स में करीब डेढ़ करोड़ रुपये कीमत का पांच ट्रक कपड़ा बिक्री के लिए गया। पायनियर कंपाउंड में कारोबारी महफूज बताते हैं, कपड़ा बाजार सुबह से ही गुलजार होता है और शाम ढलने तक चलता है।

यहां भी तौल में कपड़ा मिलता : कर्नलंगज से आसपास के जिलों में तौल के कपड़े की आपूर्ति करने वाले निसार खां बताते हैं, गम्मू खां का हाता, नीची सड़क कर्नल गंज से सलवार-सूट, पैंट-शर्ट, जनरलगंज से तौल में साड़ी-ब्लाउज का कपड़ा ज्यादा बिकता है। घुमनी बाजार से पैंट के कपड़े की बिक्री अधिक होती है। तलाक महल की दुकानों से सूट के कपड़े का काम ज्यादा होता है। मीटर की अपेक्षा तौल में बिकने वाला कपड़ा आधे से कम कीमत पर ही मिल जाता है।

मिलों से थोक में खरीदकर लाते : गुजरात के सूरत, अहमदाबाद व मुंबई की मिलों से वह कपड़ा तौल में मिलता है, जो गांठ से बच जाता है। कपड़े में कट आने पर इसे बड़े टुकड़े में काट दिया जाता है, जो औने-पौने दाम में गांठ में भरकर तौल कराने के बाद कानपुर के बाजार में भेजा जाता है। अब काटन की मांग तेजी से बढ़ी है, इसलिए उसकी कटपीस का माल भी ज्यादा मंगवाया जा रहा है। इसके साथ ही लिनेन, सिथेंटिक, चंदेरी बनारसी सूट, पंजाब का रेशमी दुपट्टा भी बहुतायत में मिलता है।

बाजार पर एक नजर

  • 1000 के आसपास हैं छोटी-बड़ी दुकानें।
  • 10 हजार लोगों को मिला है प्रत्यक्ष रोजगार।
  • 50 हजार लोग शहर व आसपास जिलों के जुड़े।
  • 1.50 लाख लोगों को मिला है यहां से रोजगार
  • 50 लाख रुपये का प्रतिदिन होता है कारोबार।
  • 600 रुपये प्रतिकिलो सिल्क साड़ी, प्रतिकिलो में चार मिलतीं, एक की कीमत पड़ती महज 150 रुपये
  • 500 से 750 रुपये प्रति किलो पैंट का कपड़ा साढ़े तीन से सात मीटर मिलता, दर पड़ती प्रतिमीटर सिर्फ 100 रुपये
  • 250 से 500 रुपये प्रतिकिलो कमीज-शर्ट का कपड़ा, 12 मीटर एक किलो में होता, 20 से 40 रुपये प्रतिमीटर
  • 250 रुपये प्रतिकिलो मिलते साड़ी के सरप्लस आइटम।

Edited By: Umesh Tiwari