कानपुर, जेएनएन। घाटमपुर का दामोदरपुर गांव गौरवान्वित है। यहां के बेटे प्रो. शमशेर ने हरकोर्ट बटलर प्राविधिक विश्वविद्यालय (एचबीटीयू) के कुलपति बन पैतृक गांव को ये गौरवशाली पल दिए हैं। घर में दो साल पहले ही बिजली आई है जबकि वर्तमान आशियाना भी कुछ ही साल पहले बना है। इन परिस्थितियों में लालटेन की रोशनी में पढ़ाई और साइकिल से सफर कर कामयाबी के शिखर तक पहुंचना वाकई काबिल-ए-तारीफ है।

गांव में उनकी करीब 82 वर्षीय मां राधा अकेली रहती हैं। आसपास रहने वाले परिवार उनका ध्यान रखते हैं। उम्र के इस पड़ाव में उन्हेंं ऊंचा सुनाई देता है। जब थोड़ी तेज आवाज में बेटे की उपलब्धि पर पूछा गया तो बोलीं कि हां पता चला है कि लड़कवा अच्छे पद पर पहुंच गया है। फोन पर बात हुई तो उन्हैैं आशीर्वाद देके कहा कि खूब कामयाब हो।

ब्वायलर से हाथ झुलसने पर छोड़ी पहली नौकरी : प्रो. शमशेर के चचेरे बड़े भाई 65 वर्षीय अशर्फीलाल बताते हैं कि उनकी पहली नौकरी एनटीपीसी कोरबा बिलासपुर में लगी। मगर दो साल बाद ही छोड़ दी। दरअसल काम करते समय ब्वायलर से उनका हाथ झुलस गया था। उसके बाद मन बनाया कि अब नौकरी नहीं करेंगे।

ठेकेदारी का काम भी किया : देवी सहाय ग्रामोद्योग विद्यालय दलेही में शिक्षक व 12वीं तक साथ में पढऩे वाले बचपन के मित्र दिलीप सचान ने बताया कि उस जमाने में जब उन लोगों के पास पैसे नहीं होते थे तो गेहूं की कटाई करने का काम ठेके पर करते थे। इससे जेब खर्च निकल आता था।

कानपुर से गांव तक साइकिल से जाते थे : एचबीटीयू में पढ़ाई के दौरान प्रो. शमशेर शनिवार को साइकिल से गांव के लिए निकल जाते थे। जब सोमवार को कानपुर लौटना होता था तो सुबह पांच बजे निकलते थे। उनके चचेरे बड़े भाई 70 वर्षीय रामचंद्र बताते है कि घर में दो साल पहले बिजली आई है। प्रो. शमशेर लालटेन की रोशनी में पढ़ते थे और आज इस मुकाम पर पहु्ंचने पर बहुत गर्व है।

बेटी एम्स में डॉक्टर, बेटा इंजीनियर : प्रो. शमशेर का विवाह कानपुर देहात के गुटैया गांव निवासी सुनीता देवी से हुआ है। उनकी बड़ी बेटी डॉ. प्रतिभा ने दिल्ली से एमबीबीएस व एमडी की पढ़ाई की है और अब ऑल इंडिया इंस्टीट््यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) में नौकरी कर रही हैं। उनकी शादी हो गई हैं, उनके पति अमेरिका में डॉक्टर हैं। छोटा बेटा प्रियांशु बेंगलुरु में इंजीनियर है।

सरल और नम्र है स्वभाव : गांव के नरेंद्र सचान बताते हैं कि प्रो. शमशेर नम्र स्वभाव के हैं। दीपावली व होली में जब भी गांव आते हैं सभी से मिलते हैं। उनके पांच बीघा खेत हैं जिनमें वह यहां आकर अपना समय बिताते हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि वह इतने बड़े पद पर पहुंच गए हैं।  

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