यशा माथुर। Azadi Ka Amrit Mahotsav पिछले दिनों कानपुर में राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने देश की स्वाधीनता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गुमनाम सेनानियों के योगदान को लोगों के सामने लाए जाने का जिक्र किया। इस क्रम में उन्होंने अजीजन बाई जैसी योद्धा को याद किया जो एक तवायफ वीरांगना थीं। उन्होंने खतरा मोल लेकर अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हिंदुस्तानी देशभक्तों को सहयोग दिया। उनके जैसी कई तवायफ वीरांगनाएं ऐसी हुई हैं जिन्होंने अपने गायन, आर्थिक सहयोग और मुश्किल कोशिशों से आजादी के आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। उन्हें कोठेवालियां कहा गया। उनके मिशन में लाख कठिनाइयां आई होगीं, लेकिन न तो वे रुकीं और न ही पीछे हटीं। समाज का भेदभावपूर्ण रवैया और हीन नजरें भी उन्होंने झेलीं, लेकिन वे सभी बाधाएं उन्हें उनके मकसद से दूर नहीं कर सकीं। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के इस वर्ष में अगर हम उनका जिक्र न करें तो आजादी की लड़ाई का इतिहास अधूरा रह जाएगा।

घूघंट की आड़ में खबरी बनीं अजीजन बाई: एक महिला पुरुष वेश में, सीने पर मेडल से आभूषित, घोड़े की पीठ पर सवार, पिस्तौल लिए मैदान-ए-जंग में उतर गई और ब्रिटिश सैनिकों से खूब बहादुरी से लड़ी। अजीजन बाई वह नाम है जो 1857 की क्रांति में उभरकर सामने आया। वह एक ऐसी तवायफ थीं जो देश की आजादी के लिए बहादुरी से लड़ीं, कभी पर्दे में रहकर तो कभी बिना किसी पर्दे के। कहते हैं कि अजीजन बाई एक जासूस, खबरी और योद्धा थीं। उनका जन्म लखनऊ में हुआ था। उनकी मां भी एक तवायफ थीं, लेकिन देश के प्रति प्रेम अजीजन को लखनऊ से कानपुर ले आया। अजीजन बाई के घर में हिंदुस्तानी सिपाहियों की बैठकें हुआ करती थीं। बताया जाता है कि अजीजन बाई ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैनिकों के काफी नजदीक थीं। उनके कोठे में स्वतंत्रता संघर्ष की रणनीति बनाई जाती थी। एक जून, 1857 को क्रांतिकारियों ने कानपुर में एक बैठक की। इसमें नाना साहब, तात्या टोपे के साथ सूबेदार टीका सिंह, शमसुद्दीन खां और अजीमुल्ला खान के अलावा अजीजन बाई ने भी शिरकत की थी। इसी बैठक में हाथ में गंगाजल लेकर इन सबने अंग्रेजों की हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकने का संकल्प लिया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के सेंटर फार वुमंस स्टडीज की प्रोफेसर लता सिंह ने भारत की आजादी के संघर्ष में तवायफों के योगदान पर एक शोध पत्र लिखा है, जिसमें अजीजन बाई का उल्लेख है। लता सिंह के अनुसार 1857 की क्रांति में कानपुर से अजीजन बाई के संघर्ष का उल्लेख मिलता है। उन्होंने महिलाओं का एक ऐसा समूह बनाया था जो स्वतंत्रता सेनानियों का साथ देने, हथियारों से लैस सिपाहियों का मनोबल बढ़ाने, उनके घावों की मरहम पट्टी करने और हथियारों को वितरित करने को तैयार रहता था। लता सिंह कहती हैं, यहां तक कि स्वाधीनता सेनानी वीर सावरकर ने भी अपने राष्ट्रवादी लेखों में अजीजन बाई के बारे में लिखा है कि इस नाचने वाली को सिपाही बहुत प्यार करते हैं। वह बाजार में पैसों के लिए अपना प्यार नहीं बेचती है। उसका प्यार देश से प्यार करने वालों के लिए है।

महफिल में मिले पैसे दे देती थीं क्रांतिकारियों को: फुलगेंदवा न मारो, लगत करेजवा में चोट... जैसे गीत से मशहूर हुईं रसूलन बाई ने महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन से प्रेरित होकर गहने पहनना छोड़ दिया था। उन्होंने गहने तभी पहने, जब देश आजाद हो गया। अपने प्रण के मुताबिक रसूलन बाई ने देश के आजाद होने के बाद ही शादी भी की। बाद में रसूलन बाई को संगीत नाट्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। बनारस की प्रसिद्ध गली दालमंडी में भी कभी कोठे हुआ करते थे। यहां से गूंजने वाली घुंघरुओं की झंकार ने अंग्रेजी हुकूमत को हिलाकर रख दिया था। उस दौर में राजेश्वरी बाई, जद्दन बाई से लेकर रसूलन बाई तक के कोठों पर सजने वाली महफिलें महज मनोरंजन का केंद्र ही नहीं होती थीं, बल्कि अंग्रेजों को देश से निकालने की रणनीति भी यहीं से तय होती थी। ठुमरी गायिका राजेश्वरी बाई तो हर महफिल में अंतिम बंदिश भारत कभी न बन सकेला गुलाम... गाना नहीं भूलती थीं। मशहूर अभिनेत्री नर्गिस दत्त की मां जद्दन बाई के दालमंडी कोठे पर भी आजादी के दीवानों का आना-जाना रहता था। अंग्रेजों ने कई बार उनके कोठे पर छापा मारा। प्रताडऩा से तंग आकर जद्दन बाई को दाल मंडी की गली तक छोडऩी पड़ी थी। इन सबके बावजूद महफिल से मिलने वाले पैसों को तवायफें चुपके से क्रांतिकारियों को दे दिया करती थीं। अमृतलाल नागर की किताब ये कोठेवालियां में तवायफों की जिंदगी के बारे में बहुत अच्छी तरह प्रकाश डाला गया है।

तानपूरे-तबले आदि गंगा में बहाए: एक जिक्र यह भी आता है कि इस आंदोलन में सहभागिता करने एवं आर्थिक सहयोग देने हेतु जब तवायफों ने गांधी जी से आग्रह किया तो उन्होंने तवायफों के नैतिक रूप से पतित होने की बात कहकर उनके इस आग्रह को ठुकरा दिया। जब तवायफों ने यह बात सुनी तो उन्हें बहुत दुख पहुंचा और बहुत सारी तवायफों ने नाचना-गाना बंद कर दिया। तमाम तवायफों ने अपने तानपूरे, तबले, सारंगी आदि बनारस में गंगा में बहा दिए और अपने घर में चरखा कातना शुरू कर दिए। यह निर्णय बहुत बड़ा था क्योंकि वे अपना आर्थिक आधार छोड़ रही थीं। कई सारी तवायफों ने महफिल में सिर्फ देशभक्ति के गीत गाने का फैसला किया। स्वर जीवनी कही जाने वाली सिद्धेश्वरी देवी भी महफिलों में देशभक्ति के गीत जरूर गाती थीं। ऐसी ही एक और तवायफ थीं गौहर जान, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करने के लिए स्वराज कोष में सक्रिय रूप से राशि जमा की थी।

गहनों की जगह हथकडिय़ां: गांधी जी के आंदोलन में हुस्ना बाई, विद्याधरी बाई ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। हालांकि स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी किताबों में इनका संघर्ष कहीं नहीं दिखता। वर्ष 1920 से लेकर 1922 तक के असहयोग आंदोलन के दौरान वाराणसी के समूह ने स्वतंत्रता संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए एक तवायफ सभा भी बनाई। अपने शोध पत्र में लता सिंह लिखती हैं कि इस सभा की कमान हुस्ना बाई ने संभाली और सदस्यों को एकता के साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने और गहनों की जगह लोहे की हथकड़ी पहनने के लिए प्रोत्साहित किया। वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य के अनुसार दालमंडी में कोठों पर क्रांति की कहानियां लिखने वाली तवायफों की सूची में दुलारी बाई का नाम सबसे ऊपर है। इतिहासकार वीना तलवार ओल्डनबर्ग ने करीब 35 तवायफों के साक्षात्कार के जरिए उनकी जिंदगी में झांकने की कोशिश की। वह अपनी पुस्तक द मेकिंग आफ कोलोनियल लखनऊ में लिखती हैं कि भारत की स्वतंत्रता की पहली लड़ाई में तवायफों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। बागियों का दमन करने के बाद अंग्रेजों ने जो संपत्ति जब्त की, उस सूची में इनके नाम प्रमुख थे।

तवायफों के साथ भेदभाव भरा व्यवहार: नई दिल्ली स्थित जेएनयू में  सेंटर फार वुमंस स्टडीज की प्रोफेसी लता सिंह बताती हैं कि तवायफों का राष्ट्रवादी गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान रहा, लेकिन उन्हें कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भागीदारी होने के बावजूद उन्हें इतनी पहचान नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी। समाज की सोच के चलते उन्हें भेदभाव भी झेलना पड़ा। राष्ट्रवादी आंदोलन की सार्वजनिक बैठकों में तवायफों की उपस्थिति को भद्र महिलाएं अच्छा नहीं मानती थीं। कांग्रेस के एक सत्र में गौहर जान का आना आदरणीय महिलाओं को पसंद नहीं आया और इस महान गायिका को बाहर ही रहने को कह दिया गया। किराना घराने की गायिका गंगू बाई हंगल 1924 में जब बेलगाम कांग्रेस अधिवेशन में गईं तो उसमें गांधी जी भी आए हुए थे। तब उनसे अलग खाना खाने के लिए कहा गया था।

Edited By: Shaswat Gupta