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सल्ले चचा का रामलीला से अनोखा रिश्ता, बनाते रावण का पुतला और राम लक्ष्मण के धनुष बाण, तीसरी पीढ़ी भी निभा रही जिम्मेदारी

Published: Sat, 17 Oct 2026 03:20 PM (IST)

कोंच की 174 साल पुरानी रामलीला में एक मुस्लिम परिवार रावण और मेघनाद के पुतले तथा राम-लक्ष्मण के धनुष-बाण तैयार ...और पढ़ें

रावण-मेघनाद के पुतलों को अंतिम रूप देते वहीद मकरानी और उनके पुत्र। जागरण

रावण-मेघनाद के पुतलों को अंतिम रूप देते वहीद मकरानी और उनके पुत्र। जागरण

HighLights

  1. मुस्लिम परिवार 174 साल से रामलीला के पुतले बना रहा है

  2. सल्ले चचा ने शुरू की थी यह सामाजिक सद्भाव की परंपरा

  3. वहीद मकरानी का परिवार अब तीसरी पीढ़ी में निभा रहा जिम्मेदारी

संवाद सहयोगी, कोंच(उरई)। बुंदेलखंड अपने अनोखे रीति रिवाज और तीज त्योहार के साथ मजबूत सामाजिक सदभावना के लिए भी जाना जाता है। इन्हीं परंपराओं में कोंच की रामलीला मंचन भी है। यहां सल्ले चचा ने जो रामलीला मंचन के लिए पुतला तैयार करने की परंपरा प्रारंभ की वह आज भी उनके परिवार की अगली पीढ़ी उसे बरकरार रखे हुए है।

मंचन में मुस्लिम परिवार के इस जुड़ाव से जो सामाजिक सदभाव की परंपरा शुरू हुई वह आज भी कायम है। यहां तक कि मुस्लिम परिवार ही राम-लक्ष्मण का मंचन करने वाले कलाकारों के लिए धनुष-बाण भी तैयार करता है।


बगैर रावण के रामलीला की कल्पना अधूरी है। रावण का पुतला जितना विशाल और आकर्षक होता है, दशहरा मैदान में दर्शकों का उत्साह उतना ही बढ़ जाता है। कोंच की 174 वर्ष पुरानी रामलीला में रावण और मेघनाद के पुतलों को दौड़ते देखने के लिए हजारों की भीड़ जुटती है।

कोंच की रामलीला में मारीच वध, जटायु-रावण युद्ध और राम-रावण युद्ध जैसी चलायमान लीलाएं आकर्षण का केंद्र रहती हैं। इनमें रावण, मेघनाद, जटायु और मारीच के पुतलों को मैदान में दौड़ाया जाता है।

रावण के दस सिर चारों दिशाओं में इस तरह लगाए जाते हैं कि उसका बहुमुखी स्वरूप दिखाई दे। पुतलों को इस तकनीक से तैयार किया जाता है कि उन्हें गाड़ी से बांधकर मैदान में दौड़ाया जा सके। यही नजारा देखने के लिए दशहरा मैदान में दर्शकों की भीड़ उमड़ती है।

सल्ले चचा से शुरू हुआ सफर

मालवीय नगर निवासी सल्ले चचा ने सबसे पहले रामलीला के लिए रावण, मेघनाद, जटायु और मारीच के पुतले बनाने शुरू किए थे। उनके भतीजे नूर मोहम्मद भी इस काम में हाथ बंटाते थे। बाद में नूर मोहम्मद ने वर्ष 1986 तक यह जिम्मेदारी निभाई। उनके निधन के बाद उनके शागिर्द वहीद मकरानी ने पुतले बनाने का काम संभाल लिया। अब वहीद अपने बेटों, दामादों, नातियों और भांजे को इस कला में पारंगत कर रहे हैं, ताकि वर्षों पुरानी परंपरा आगे भी जारी रहे।

90 हजार रुपये में तैयार हो रहे पुतले

करीब 70 वर्षीय वहीद मकरानी बताते हैं कि उन्होंने अपने तीनों बेटों मुकीम अहमद, वसीम अहमद और नसीम अहमद के साथ दामाद जाकिर व शहीद, नातियों अनस व रिहान और भांजे फिरोज को भी पुतले बनाने का हुनर सिखाया है। पहले उन्हें पुतले बनाने के लिए 1100 रुपये पारिश्रमिक मिला था, लेकिन बढ़ती महंगाई के कारण इस वर्ष 90 हजार रुपये में ठेका लिया गया है।

इसमें 40 फीट ऊंचे रावण और मेघनाद के पुतलों के अलावा जटायु-मारीच के पुतले तथा श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के धनुष-बाण तैयार करने हैं। उन्होंने बताया कि पूरा परिवार मिलकर करीब एक महीने में यह काम पूरा करता है। इस वर्ष 25 सितंबर से पुतले बनाने का काम शुरू किया गया। रावण और मेघनाद के पुतलों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। पुतले बनाने का सामान वह कानपुर से लाते हैं। वर्ष भर कहीं भी रहें, रामलीला के समय कोंच जरूर पहुंचते हैं, ताकि समय पर पुतले तैयार हो सकें।

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