भाषा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व की पहचान कराती है
जागरण संवाददाता, हापुड़ भाषा में अगर संस्कार न हो तो अपने भी पराये और पराये अपने बन जाते
जागरण संवाददाता, हापुड़
भाषा में अगर संस्कार न हो तो अपने भी पराये और पराये अपने बन जाते हैं। भाषा ही वह माध्यम है, जो हमें लोगों से जुड़ने की कला सिखाती है। भाषा ही हमारे विचारों के संप्रेषण का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके द्वारा ही पता चलता है कि व्यक्ति के संस्कार, व्यक्तित्व और शैक्षिक योग्यता का स्तर क्या है। प्रधानाचार्या आराधना वाजपेयी का कहना है कि भाषा के द्वारा ही हम किसी दूसरे व्यक्ति के भावों, विचारों के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व व पारिवारिक-पृष्ठभूमि का परिचय प्राप्त करते हैं। भाषा के संस्कारों को मनुष्य ने लाखों वर्ष पूर्व पहचान कर उसका निरंतर विकास किया है। जब व्यक्ति कोई बात उच्चारित करता है या उसे लिखकर अभिव्यक्त करता है तो उसकी भाषा में उसके अंतरंग भावों के साथ-साथ उसका राज्य, वर्ग, जातीयता का भी बोध हो जाता है। इसका संबंध व्यक्ति की मानवीय संवेदनाओं और मानसिकता से भी होता है। जिस व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य और मानसिकता निम्न स्तर की होगी, उसकी भाषा उसी स्तर की रहेगी। बेहतर मानसिक संवेदना वाले व्यक्ति की भाषा भी स्वस्थ और संस्कारी होगी। अत: भाषा का संस्कारित होना अनिवार्य प्रक्रिया है। स्वस्थ और संस्कारी भाषा कभी भी दूसरों को दुख पहुंचाने वाले शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति नहीं देती है। अत: मनुष्य के लिए भाषा का महत्व सिर्फ उसकी अभिव्यक्ति क्षमता या संप्रेषण क्षमता में ही नहीं है, बल्कि व्यक्ति, जाति, संस्कृति को उजागर करने की क्षमता भी शामिल होती है। समाज में रहकर संप्रेषण-व्यापार या लोगों से बातचीत के लिए मनुष्य के पास भाषा ही एकमात्र विकल्प है। बातचीत के दौरान वक्ता और श्रोता की भूमिका बदलती है। वक्ता अपने विचारों को बोलकर संप्रेषित करता है और श्रोता उन्हें सुनकर ग्रहण करता है। इसी भाषिक संप्रेषण के द्वारा पारिवारिक, राष्ट्रीय और व्यक्ति का निजी संप्रेषण बाधा-रहित भी संभव हो सकता है, इसलिए भाषा के संस्कारों का महत्व निर्विवाद है। मनुष्य को सभ्य व पूर्ण बनाने के लिए शिक्षा जरूरी है और सभी प्रकार की शिक्षा का माध्यम भाषा ही है। साहित्य, विज्ञान, अर्थशास्त्र, सभ्यता आदि सभी क्षेत्रों में प्रारम्भिक से लेकर अधिकतम शिक्षा तक सभी स्तरों पर भाषा का संस्कार आवश्यक है। जीवन के सभी क्षेत्रों में किताबी शिक्षा हो या व्यावहारिक शिक्षा, वह भाषा के द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। प्रत्येक दृष्टिकोण से भाषा में संस्कार न हो तो मनुष्य पशु के समान है। प्रकृति ने मनुष्य को ही भाषा का संप्रेषण कर सकने की शक्ति प्रदान की है। भाषा में संस्कारों का होना हमारे व्यक्तित्व की पहचान है।
-आराधना वाजपेयी, प्रधानाचार्या, एलएन सीनियर सेकेंडरी पब्लिक स्कूल, हापुड़
दुश्मन भी बन जाता है दोस्त
विश्व के हितों को ध्यान में रखते हुए ¨चतन-मनन गहराई से किया जाता है, वह दार्शनिक ¨चतन कहलाता है। इसी ¨चतन को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक भाषा द्वारा पहुंचाया जाता है। भाषा की यही विशेषता है कि नई पीढ़ी तक पुराने लोगों द्वारा किए गए ¨चतन को निरंतर पहुंचाती रहती है, जिससे हम अपनी प्राचीन संस्कृति और परम्पराओं के बारे में पता कर पाते हैं। अगर भाषा में संस्कारों का अभाव होगा तो भावी पीढ़ी में भाषाई संस्कार नहीं होंगे, जिससे समाज में सभी एक दूसरे के दुश्मन बन जाएंगे। वास्तव में भाषा में संस्कार हो तो दुश्मन के हृदय से भी घृणा और द्वेष को दूर किया जा सकता है। विश्व में विज्ञान से लेकर भाषा-विज्ञान तक सभी क्षेत्रों में नित नए आविष्कार व शोध होते रहते हैं। इनमें अध्ययन और शोध लेखन के लिए नए-नए शब्द या पारिभाषिक शब्द रचे जाते हैं। इन शब्दों के संप्रेषण से भाषा के द्वारा सामाजिक-वैज्ञानिक विकास की अभिव्यक्ति होती है। इन नए शब्दों की खोज और प्रयोग करने का उद्देश्य भी यही है कि भाषा में संस्कार पैदा किए जाए।
-यशवीर तोमर, शिक्षक
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साहित्य भी करते हैं भूमिका अदा
भाषा में संस्कारों का महत्व अलग-अलग भौगोलिक प्रान्तों से जुड़े लेखकों, कवियों का लहजा भी उनकी भाषा के संस्कारों के कारण विशिष्ट होता है। सर्जनात्मक प्रयोगों में भाषा में संस्कारों का होना बेहद आवश्यक है। भाषा में संस्कारों का अभाव हो तो साहित्य का अस्तित्व ही संभव नहीं है। साहित्यकार भाषा में संस्कारों को नया आयाम देकर निजी भावों-विचारों की अभिव्यक्ति करते आए हैं, ताकि समाज की भाषा में संस्कार पैदा हो सके।
-मोहसीन खान, शिक्षक
..तो पैदा होगी कटुता
भाषा में संस्कारों का अभाव हो तो आपसी सद्भाव के स्थान पर कटुता का जन्म होता है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अपनी भाषा के माध्यम से ही प्रेम का संदेश दे सकता है अथवा दुष्टता का भाव दिखा सकता है। संस्कार युक्त भाषा के द्वारा ही शिक्षित समाज का भी विकास-नवनिर्माण संभव है। अलग अलग प्रकार की भौगोलिक, सांस्कृतिक विविधता होने पर भी मनुष्य अपनी भाषा के द्वारा किसी भी परिस्थितियों में अपने लिए महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है। इससे समाज में उसके प्रति लोगों का नजरिया सम्मान भरा बन जाता है और वह मनुष्य सदियों तक दूसरों के लिए एक उदाहरण बनकर प्रस्तुत किया जाता है। महात्मा गांधी जी ने अपनी संस्कारयुक्त भाषा के द्वारा ही अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। गुलामी सहते हुए भी महात्मा गांधी जी ने अपनी भाषा के संस्कारों को नहीं छोड़ा। हमें बालकों में भी भाषाई संस्कार पैदा करने होंगे तभी एक सभ्य समाज का निर्माण संभव है। -राजीव द्विवेदी, शिक्षक
परिवार व शिक्षकों की भी जिम्मेदारी
वास्तव में जीवन और समाज का ऐसा कोई पक्ष नहीं है, जहां भाषा में संस्कारों की आवश्यकता न हो। यहां तक कि सभ्यता के विकास के लिए भी भाषा का संतुलित और संस्कारयुक्त होना बेहद जरूरी है। बालकों में इसका विकास बचपन से ही परिवार और शिक्षकों द्वारा किया जाना जरूरी है। केवल सभ्य और संस्कारवान होना जरूरी नहीं है, अपने संस्कारों और सभ्यता की अभिव्यक्ति के लिए भाषा भी संस्कारयुक्त हो, ये बेहद आवश्यक है।
-आकर्ष अग्रवाल, छात्र कक्षा 12
भाषाई संस्कार जरूरी
भाषा का सीधा संबंध संस्कार और सभ्यता से है। विश्व में जितने भी देश आज अग्रणी हैं, वे अपनी भाषा की वजह से ही वहां तक पहुंचे हैं। यदि हमें भारत को विश्व का सिरमौर बनाना है तो हमें अपनी भाषा और उसके संस्कारों को मजबूत करना होगा। बच्चे भाषा का संस्कार पहले घर से सीखता है और फिर स्कूल में। इसके लिए जरूरी है कि देश की बुनियादी शिक्षा में बदलाव हो।
-ईशा अग्रवाल, छात्र, कक्षा 12
अच्छा सुनाई देना भी जरूरी
अभिभावक हमेशा अपने बालकों में भाषा के संस्कार पैदा करना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें स्वयं को भी इन संस्कारों के अधीन करना होगा, तभी बालक उनसे भाषा के संस्कारों को आत्मसात कर सकेगा। विद्यालय में शिक्षकों की यही जिम्मेदारी है। केवल अच्छा होना और दिखाई देना पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि भाषा में भी संस्कारों का होना जरूरी है।
-सोनाक्षी शर्मा, कक्षा 12
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