गोरखपुर, जागरण संवाददाता। कालानमक चावल को वैश्विक पटल पर ख्याति दिलाने के लिए तीन वर्ष पहले एक जिला-एक उत्पाद में इसका चयन किया गया। सरकारी आंकड़ों में तीन हजार हेक्टेयर की खेती बढ़कर 10 हजार हेक्टेयर भूमि भी हो गई है। बाजार भी तैयार हो रहा है, पर खुशबू लौटाने की चुनौती बनी हुई है।

कामन फैसिलिटी सेंटर का चल रहा निर्माण

स्थानीय स्तर पर इसको बेहतर बाजार देने के लिए खेसरहा ब्लाक के मदुआपुर गांव में कामन फैसिलिटी सेंटर का निर्माण चल रहा है। इस वर्ष किसानों को उम्मीद थी कि वह इस सेंटर पर सीधे उचित मूल्य पर अपना उत्पाद बेच सकेंगे, लेकिन उनकी मंशा धरी रह गई। 31 दिसंबर 2021 तक इसे चालू करने का आदेश था। किसानों को धान का उचित मूल्य और अ'छी प्रजाति का बीज मिल सके, इसके लिए ब्लाक स्तर तक इसे जोड़ा जाना था। 6 करोड़ 98 लाख से सेंटर का निर्माण हो रहा है। एक करोड़ अस्सी लाख रुपये का बजट अभी शासन से मिलना है। आठ मशीनें लगनी हैं। इसमें पेडीक्लीनर, डिस्टोनर, डीहस्कर लग चुकी हैं। यहां किसान अपनी उपज सीधे बेच सकेंगे।

जमीनदारी नहर प्रणाली के जरिए खेत में पहुंचता था पानी

जिले के बर्डपुर व शोहरतगढ़ क्षेत्र में महली, बजहा, मझौली, बटुआ, मरथी, सिसवा, शिवपति, सेमरा, मोती नाम से नौ सागर यानी बड़े तालाब हैं। नेपाल के पहाड़ों का पानी इन सागरों से होकर जमींदारी नहर प्रणाली से खेतों में जाता था, जो स्थान कालानमक की खेती के लिए अनुकूल है। इधर, कालानमक की खेती को बढ़ाने के लिए शोध हुए और लंबे तने की जगह कम लंबाई वाले बीज विकसित किए गए, लेकिन कभी खुशबू बरकरार रखने के लिए कोई खास उपाय नहीं हुए।

पहाड़ी जड़-बूटी से होकर आता था पानी

बुद्ध विद्यापीठ सिद्धार्थनगर के प्रबंधक राजेश शर्मा ने बताय कि जब तक पहाड़ की जड़ी-बूटियों से होकर पानी सागरों तक आता था और सिर्फ गोबर की खाद का प्रयोग होता था, कालानमक की महक बरकरार रही। सरकार इसके बाजारीकरण पर तो ध्यान दे रही है, लेकिन महक पर नहीं। इसके लिए फिर से जमींदारी नहर प्रणाली को विकसित करना होगा। गोबर की खाद ही बेहतर विकल्प है। पर इस क्षेत्र में पशु पालन पर काम नहीं हो पा रहे।

किसानों से धान खरीद कर की जाएगी पैकिंग

कामन फैसिलिटी सेंटर के संचालक अभिषेक सिंह ने बताया कि किसानों का धान खरीदकर उनकी कुटाई, पैकिंग के साथ ही ब्रा‍ंडिंग करने की योजना बनी है। अभी यह कार्य दिल्ली में किया जा रहा है। यहां मशीनें आ चुकी हैं। जल्द ही उन्हें लगा दिया जाएगा। जापान से आने वाली मशीन भी वहां पैक हो चुकी है। चावल को बराबर एक तापमान पर रखा जाएगा, जिससे उसकी महक बरकरार रहेगी।

क्‍या कहते हैं किसान

मंझरिया निवासी किसान रामबरन चौधरी ने बताया कि करीब आठ एकड़ में बड़ी प्रजाति के कालानमक की खेती करता हूं। पैदावार जरूर कम होती है, लेकिन चावल अ'छी कीमत में बिक जाता है, जिस कारण लागत के अपेक्षा मुनाफा ज्यादा होता है। उर्वरक खादों का प्रयोग नहीं कराना चाहिए। मैं कभी नहीं करता। इससे खुशबू रहती है। हां, यह जरूर है कि जो खुशबू एक दशक पहले मिलती थी, उतनी नहीं है।ठाकुरपुर के मोहम्‍मद अनीस का कहना है कि कालानमक बौना और परंपरागत दोनों की खेती करीब तीन एकड़ में करता हूं। बौना प्रजाति के चावल की कीमत कम मिलती है। उसमें महक कम होती है। लागत से करीब 40 से 45 हजार की आमदनी हो जाती है। पहले आसानी से गोबर की खाद मिल जाती थी। किसान मजबूरी में उर्वरक डालने को मजबूर हैं, इससे वह महक नहीं मिल पाती, जो पहले मिलती थी।

कालानमक की खेती पर सरकार का है पूरा ध्‍यान

जिला कृषि अधिकारी सीपी सिंह ने बताय कि कालानमक की खेती पर सरकार का पूरा ध्यान है। इसका रकबा लगातार बढ़ रहा है। कामन फैसिलिटी सेंटर का निर्माण अंतिम चरण में है। जैसे ही यह सेंटर शुरू होगा, किसानों के उत्पाद का मूल्य स्थानीय स्तर पर ही मिल जाएगा। इस चावल की पांच प्रजातियां विकसित की गई हैं। इसकी महक लौटाने के लिए भी प्रयास किए जाएंगे।

डिजिटल प्‍लेटफार्म पर की जा रही ब्रां‍डिंग

जिला उद्योग केंद्र के उपायुक्‍त दयाशंकर सरोज ने बताय कि कपिलवस्तु महोत्सव में डिजिटल प्लेट फार्म पर इसकी ब्राङ्क्षडग की गई थी। इससे बीस से तीस प्रतिशत कीमत बढ़ गई है। पिछले वर्ष ङ्क्षसगापुर में 33 टन काला नमक चावल भेजा गया था। इस वर्ष 50 टन का आर्डर मिला है।

Edited By: Navneet Prakash Tripathi