गोरखपुर :स्वास्थ्य विभाग की टीम ने इस साल अप्रैल महीने में सहजनवां क्षेत्र के ठर्रापार, पाली में संचालित हो रहे नंदिनी पैथोलॉजी पर छापा मारा। पता चला कि पैथालॉजी का पंजीकरण नहीं है। मौके पर कोई पैथोलॉजिस्ट भी नहीं था। पैथोलॉजी सील कर दी गई और संचालक पर एफआरआर दर्ज कराया गया। सील तोड़कर भी संचालन

मार्च महीने में गोरखपुर शहर के सिंघड़िया क्षेत्र के तीन पैथोलॉजी सेंटरों ट्रांसलैब डाइग्नोस्टिक सेंटर, कृष्णा डाइग्नोस्टिक सेंटर व स्टार डाइग्नोस्टिक पर स्वास्थ्य विभाग की टीम ने छापा मारा। अवैध रूप से संचालित होने पर सेंटर सील कर दिए गए। बाद में सील तोड़कर संचालन की सूचना मिली। इसके बाद एफआइआर दर्ज कराया गया। यह चार मामले तो महज उदाहरण हैं। शहर से लेकर गांव तक अवैध पैथोलॉजी सेंटरों का जाल फैलता जा रहा है। ग्रामीण इलाकों तक में हर बड़े बाजार व चौराहों पर अनेक पैथोलॉजी सेंटर संचालित होते मिल जाएंगे। यहां तक कि कुछ झोला छाप डाक्टर तक छोटी मशीनें रख खून-पेशाब की जांच कर रहे हैं। कैसे चल रहे अवैध पैथोलॉजी सेंटर

गंभीर तो यह है कि स्वास्थ्य विभाग के अफसर यह अच्छी तरह जानते हैं कि सीएमओ कार्यालय में सिर्फ 81 पैथोलॉजिस्ट ही पंजीकरण हैं। इसके बावजूद वह जानने की कोशिश नहीं करते कि आखिर कैसे जिले में तीन सौ से ज्यादा सेंटर संचालित हो सकते हैं। गंभीर तो यह है कि सिर्फ इस साल अवैध रूप से संचालित हो रहे ऐसे 15 सेंटरों में बारे में सूचना मिलने पर कार्रवाई हो चुकी है। अगस्त महीने के पहले हफ्ते में बीआरडी मेडिकल कॉलेज के दो पैथोलॉजिस्ट के नाम पर फर्जी पैथोलॉजी सेंटर के संचालन की बात सामने आई। इस मामले में जांच के बाद इसके पीछे लगे लोगों के चेहरे बेनकाब भी हुए। गिरफ्तारी भी हुई। इसके बावजूद भी अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। इतनी बड़ी तादाद में चल रहे सेंटरों की सच जानने की कोशिश तक नहीं कर रहे। कोई कारगर अभियान नहीं चलाया जा रहा है। नतीजा लोगों की सेहत से खिलवाड़ जारी है। जुगाड़ की मशीनें और शुरू कर दिया सेंटर

शहर में चूंकि सबकी नजर पड़ती है लिहाजा किसी पैथोलॉजिस्ट के मूल प्रमाण-पत्र लेकर सीएमओ आफिस से गलत तरीके से पंजीकरण कर सेंटर चलाने के मामले सामने आए हैं, लेकिन गांवों में तो हालात काफी बदतर हैं। यहां तो हाल है कि बाजार व गलियों तक में ऐसे सेंटर हैं जहां संचालक छोटी-बड़ी मशीनों का जुगाड़ कर जांच शुरू कर देते हैं। यह मशीनें सेकेंड हैंड या निम्न स्तर की होती हैं। जांच में प्रयुक्त होने के वाले रसायन भी बेहद कामचलाऊ होते हैं। ऐसे में रिपोर्ट का अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं। संचालन करने वाले कई तो खुद झोला छाप डाक्टर हैं। बाकी सेंटर भी झोला छाप डाक्टरों के भरोसे चल रहे हैं। डाक्टर का नाम असली, लाइसेंस नकली

अगस्त महीने में सामने आई इन दो घटनाओं से यह साफ हो चुका है कि नकली पैथोलॉजी सेंटरों के धंधे में लगे लोग न केवल शातिर हैं जबकि उनके हाथ भी काफी लंबे हैं। मेडिकल कॉलेजों या अन्य संस्थानों से डॉक्टरों के नाम के कागजात निकलवाने से लेकर सिस्टम की लापरवाही का फायदा उठाकर सीएमओ आफिस से लाइसेंस बनवाने तक का काम वह बड़ी सफाई से करते हैं। यह बात मेडिकल कॉलेज के दो डॉक्टरों के नाम पर बने लाइसेंस से साबित हो जाती है। हद तो यह है कि यह मामला भी संयोग से ही पकड़ में आया। यदि खुद मेडिकल कॉलेज के संबंधित डॉक्टरों ने इसे पकड़ा न होता तो शायद अब भी यह जालसाज पकड़ से दूर होते।

Posted By: Jagran