गोरखपुर में दवाओं की मोनोपॉली: कमीशन के खेल में महंगी हो रहीं दवाएं, मरीज परेशान
गोरखपुर में चिकित्सकों द्वारा कमीशन के लालच में मोनोपोली वाली दवाएं लिखने से मरीजों को महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही ...और पढ़ें

तगड़े कमीशन की लालच में चिकित्सक लिखते हैं मोनोपोली की दवाएं। जागरण
HighLights
चिकित्सक कमीशन के लालच में मोनोपोली दवाएं लिखते हैं।
इटोलिव जैसी दवाएं तीन गुना महंगी बेची जा रही हैं।
खाद्य एवं औषधि प्रशासन का दवाओं के मूल्य पर नियंत्रण नहीं।
आशुतोष मिश्र, गोरखपुर। आयुष विश्वविद्यालय में स्वजन का उपचार करा रहे दिनेश को लिवर की एक दवा बाहर से खरीदनी पड़ती है। दो माह पहले उन्हें 30 गोली वाली दवा की डिब्बी 150 रुपये में मिलती थी, जो अब उन्हें 450 रुपये में खरीदनी पड़ रही है।
इटोलिव नाम की यह दवा खरीदते हुए उन्होंने मेडिकल स्टोर संचालक से पूछा कि अचानक से तीन गुणा महंगी क्यों हो गई? दुकानदार ने नए बैच नंबर का हवाला दिया। कहा- इस दवा को बेचने में लाभांश बहुत कम है। वो तो डाक्टर साहब लिखते हैं, बस इसीलिए इसे रखते हैं।
यह तो महज एक उदाहरण है। उपचार में हावी मोनोपाली के चलते रोगियों को ऐसी बहुत सी गोलियां लूट रही हैं। एलोपैथ हो या आयुष पद्धति की दवाएं, सबमें कमीशन का यह खेल चल रहा है। आयुर्वेद में त्रिफला, सतावर, अश्वगंधा जैसी जड़ी-बूटियों को डाबर जैसी ब्रांडेड कंपनी जिस मूल्य में बेचती है, मोनोपोली के तहत इन्हीं जड़ी-बूटियों के नाम में थोड़ी हेरफेर कर उससे कई गुणा अधिक कीमत पर बेचा जाता है।
डाक्टर के पर्चे पर लिखी गई दवा पर भरोसा जताते हुए रोगी और तीमारदार इन्हें खरीद लेते हैं। एलोपैथ की दवाओं में भी ऐसा हो रहा है। मोनोपोली की दवाएं सीधे कंपनी से अपने ब्रांड नेम के तहत पैकेजिंग कराकर मनचाही एमआरपी डलवाकर धंधेबाज बाजार में उतार देते हैं। इनके एमआर 30 से 50 प्रतिशत कमीशन का लालच देकर चिकित्सकों को ये दवाएं लिखने को राजी करते हैं।

कई निजी अस्पतालों के मेडिकल स्टोर में खास दवाएं
कई निजी अस्पतालों के मेडिकल स्टोर में इसी तरह की मोनोपोली की दवाएं बेची जा रही हैं। शहर के एक बड़े चिकित्सक अपने नाम से मिलते-जुलते नामों की दवाएं रोगियों के पर्चे पर लिखते हैं, जो केवल उसी अस्पताल के मेडिकल स्टोर में ही मिलती हैं।
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मनचाही एमआरपी के इस खेल पर स्थानीय नियंत्रण नहीं
खाद्य एवं औषधि प्रशासन की टीम दवाओं की जांच करती है। लेकिन, मोनोपोली और मनचाही एमआरपी के इस खेल पर उसका कोई नियंत्रण नहीं है। ड्रग प्राइस कंट्रोल अथारिटी जो कि केंद्र सरकार के अधीन आती है, वही दवाओं के मूल्य पर कार्रवाई कर सकती है।
