गोरखपुर में प्रतिबंधित मांझे ने छीना बुढ़ापे का सहारा, अस्पताल में पत्नी की चीत्कार; पिता बेसुध
गोरखपुर में प्रतिबंधित मांझे की धार से रमेश की मौत के बाद अस्पताल में उनकी पत्नी पूर्णिमा और परिवार का ...और पढ़ें

रोते बिलखते परिजन व इनसेट में मृतक। जागरण
HighLights
रमेश की प्रतिबंधित मांझे से हुई दुखद मौत।
पत्नी पूर्णिमा और बच्चों का गहरा सदमा।
परिवार का एकमात्र सहारा छिन गया, मातम।
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। अस्पताल में पत्नी पूर्णिमा की चीत्कार गूंज रही थी। आसपास खड़े लोग उसे देखकर अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे। किसी की आंखें नम थीं तो कोई परिवार को ढांढस बंधाने की कोशिश कर रहा था। पिता फकीरे कन्नौजिया बेसुध बैठे थे।
चेहरे पर ऐसा दुख था, मानो जिंदगी का सबसे मजबूत सहारा अचानक छिन गया हो। जिस बेटे के भरोसे बुढ़ापे की गाड़ी आगे बढ़ रही थी, उसके हमेशा के लिए चले जाने की खबर ने उन्हें भीतर तक तोड़ दिया था।
पूर्णिमा की आंखों के सामने कभी पति का चेहरा आता तो कभी बच्चों का भविष्य। जिस घर में कुछ देर पहले तक जिंदगी की सामान्य हलचल रही होगी, वहां अब हर तरफ गम का अंधेरा था। रमेश की 11 वर्षीय बेटी अपर्णा और सात साल का बेटा आर्यन शायद अभी यह भी नहीं समझ पा रहे होंगे कि उनके जीवन में कितनी बड़ी रिक्तता आ गई है।
रमेश अपने माता-पिता की देखभाल भी करते थे। घसीकटरा स्थित दूसरे मकान में रहने वाले फकीरे कन्नौजिया और मुन्नी देवी के लिए बेटा ही सबसे बड़ा सहारा था। बेटे के जाने से उनका पूरा संसार ही उजड़ गया।
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पिता की बेसुध खामोशी और परिवार के सदस्यों का विलाप उस पीड़ा को बयां कर रहा था। प्रतिबंधित मांझे की धार से लगी चोट केवल रमेश के शरीर पर नहीं लगी, उसने पूरे परिवार के भविष्य पर गहरा घाव कर दिया। अस्पताल में गूंजती सिसकियां यही सवाल छोड़ रही थीं।
