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    बोले जल पुरुष राजेंद्र सिंह-अलकनंदा पर बांध बनाने से फूटा प्रकृति का गुस्सा

    By Satish chand shuklaEdited By:
    Updated: Tue, 09 Feb 2021 06:17 PM (IST)

    उन्होंने बताया कि बीते 20 वर्ष से वह अलकनंदा मंदाकिनी और भागीरथी नदियों पर बांध बनाने का विरोध कर रहे हैं। तीन बांध को बनने से रोकने में वह सफल रहे जबकि आठ बांध विरोध के बाद भी बन गए।

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    बातचीत करते जल पुरुष और पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह।

    गोरखपुर, जेएनएन। जल पुरुष और पर्यावरणविद् राजेंद्र सिंह उत्तराखंड की त्रासदी से दुखी होने के साथ-साथ नाराज भी हैं। उनकी नाराजगी अलकनंदा, मंदाकिनी और भागीरथी नदी पर बांध बनाने को लेकर है। मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के दीक्षा समारोह में बतौर मुख्य अतिथि शामिल होने पहुंचे राजेंद्र सिंह ने इसे लेकर खुलकर बात की।

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    नदियों पर बांध बनाने का दो दशक से हो रहा विरोध

    उन्होंने बताया कि बीते 20 वर्ष से वह इन नदियों पर बांध बनाने का विरोध कर रहे हैं। तीन बांध को बनने से रोकने में वह सफल रहे जबकि आठ बांध विरोध के बाद भी बन गए। दरअसल ये तीनों नदियां भूकंप प्रभावित क्षेत्र में हैं, ऐसे में वहां निर्माण होना ही नहीं चाहिए। निर्माण किया गया, सो प्रकृति का गुस्सा फूट पड़ा। विकास के दौर में सुरक्षा को दरकिनार करने का नतीजा हमें भुगतना पड़ा है। घटना की वैज्ञानिक वजह पर चर्चा करते हुए जल पुरुष ने कहा कि अलकनंदा, भागीरथी, मंदाकिनी नदियां, जिसमें बहुत से गुणकारी तत्व हैं। धाराओं के मिलने से इसकी गुणवत्ता में और वृद्धि हो जाती है। लेकिन बांध बनाकर इनके प्रवाह को रोका जाता है तो वह तत्व सिल्ट बनकर नीचे बैठ जाते हैं और नदी का प्रवाह और तेज हो जाता है, जिसका परिणाम विनाशकारी होता है। उन्होंने कहा कि हमें आस्था और विज्ञान दोनों को ध्यान में रखकर अलकनंदा को बांधना नहीं चाहिए। ऐसी कई नदियां हैं, जहां बांध बनाए जा सकते हैं। भविष्य की सुरक्षा के लिए इन तीन नदियों को विकास के लिए इस्तेमाल के दायरे में बाहर रखना होगा। इन्हें निर्बाध बहने देना चाहिए।

    समझना होगा तीर्थाटन और पर्यटन के अंतर

    जल पुरुष ने कहा कि अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी नदियां भारत की जीवनदायिनी नदियां हैं। इसी वजह से इनके तट हमारे तीर्थस्थल हैं। अब इन्हें पर्यटन स्थल बनाने की कोशिश की जा रही है, जो कि गलत है। पर्यटन और तीर्थाटन के अंतर को समझना होगा। तीर्थाटन में आस्था का भाव होता है जबकि पर्यटन में भोग का। जब तीर्थ स्थल को भोग की दृष्टि से इस्तेमाल किया जाएगा तो तबाही तय है।

    सूख रही हैं नदियां, बनाना होगा डिस्चार्ज और रीचार्ज में संतुलन

    जल पुरुष राजेंद्र सिंह ने नदियों के सूखने की गहरी चिंता जताई। कहा कि देश की दो-तिहाई नदियां सूख गई हैं जबकि एक तिहाई नाले में तब्दील हो गई हैं। यहां तक कि आमी नदी को नाला घोषित करने की तैयारी थी, आंदोलन की वजह से ऐसा नहीं हो सका। नदियों के सूखने की वजह डिस्चार्ज और रीचार्ज का संतुलन बिगडऩा है। नदियों को बचाने के लिए यह संतुलन बनाना ही होगा।