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गोरखपुर के पहले नेत्र सर्जन डॉ. नरेंद्र मोहन सेठ का निधन, चिकित्सा सेवा का एक युग समाप्त

Published: Wed, 04 Nov 2026 10:49 AM (IST)

गोरखपुर के पहले नेत्र सर्जन डॉ. नरेंद्र मोहन सेठ का 99 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने अपना ...और पढ़ें

डाॅ. नरेंद्र मोहन सेठ। फाइल फोटो

 डाॅ. नरेंद्र मोहन सेठ। फाइल फोटो

HighLights

  1. गोरखपुर के पहले नेत्र सर्जन, 99 वर्ष में निधन।

  2. लाखों नेत्र रोगियों का इलाज, सेवा को समर्पित।

  3. सीतापुर आई हॉस्पिटल की स्थापना, 'गोरखपुर रत्न' से सम्मानित।

जागरण संवाददाता, गोरखपुर। डाॅ. नरेंद्र मोहन सेठ ने 99 वर्ष की आयु में मंगलवार को बेतियाहाता स्थित आवास पर अंतिम सांस ली। वह जिले के पहले नेत्र सर्जन थे। उनकी पहचान सिर्फ एक कुशल चिकित्सक के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे इंसान के रूप में थी, जिसने चिकित्सा को सेवा का माध्यम बनाया। गरीबों को आंखों की रोशनी देने के लिए उन्होंने न सिर्फ अपना जीवन समर्पित किया, बल्कि शहर के बीचोंबीच दो एकड़ जमीन पर सीतापुर आई हॉस्पिटल की स्थापना कर हजारों जरूरतमंदों के उपचार का रास्ता खोला।

डाॅ. सेठ का जीवन संघर्ष, संकल्प और सेवाभाव की मिसाल रहा। देश के बंटवारे के समय वह लाहौर के किंग जार्ज मेडिकल कालेज में एमबीबीएस तृतीय वर्ष के छात्र थे। जुलाई 1947 में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने पर उन्हें माता-पिता और बहनों के साथ अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। परिवार दिल्ली के शरणार्थी शिविर में पहुंचा। बाद में पाकिस्तान से आए मेडिकल छात्रों को भारतीय मेडिकल कालेजों में प्रवेश दिया गया। डा. सेठ को 30 अन्य छात्रों के साथ पटना मेडिकल कालेज आवंटित हुआ। शुरुआती दिन शिविर और मंदिर में गुजारने पड़े। वर्ष 1950 में एमबीबीएस और 1952 में पंजाब से एमएस की पढ़ाई पूरी की।

इसके बाद सीतापुर आई हास्पिटल में नौकरी शुरू की। वहां के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक ने गोरखपुर में गरीबों के लिए नेत्र अस्पताल खोलने की सलाह दी। डा. सेठ 1953 में गोरखपुर आ गए और रीड साहब की धर्मशाला में अपना अस्पताल शुरू किया। मरीजों से मिलने वाली एक-दो रुपये की चंदा राशि के लिए उन्होंने मेज पर एक बाक्स रख दिया था।

इसी तरह जुटे करीब 20 हजार रुपये से अस्पताल का पहला ब्लाक 1956 में तैयार हुआ। स्व. बीएम सहाय ने अस्पताल के लिए दो एकड़ जमीन दान की थी। बाद में इसका विस्तार 3.3 एकड़ में हो गया। सात वर्षों के भीतर यह अस्पताल 150 बेड की सुविधा वाले संस्थान के रूप में विकसित हो गया।

डाॅ. सेठ का सेवाभाव अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं था। दूरदराज के गांवों में गरीब मरीजों तक पहुंचने के लिए वह साइकिल, हाथी और बैलगाड़ी तक से सफर करते थे। एक बार निचलौल में चिकित्सा शिविर लगाने के बाद बैलगाड़ी से सिसवा जाते समय डाकुओं ने उन्हें घेर लिया था। उनकी पहचान जानने के बाद डाकुओं ने उन्हें छोड़ दिया।

डा. नरेंद्र मोहन सेठ ने अपने जीवनकाल में तीन लाख से अधिक नेत्र आपरेशन किए और 15 लाख से अधिक नेत्र रोगियों का उपचार एवं सेवा की। 2500 से अधिक नेत्र चिकित्सा शिविरों का आयोजन किया। सेवानिवृत्ति के बाद भी 92 वर्ष की आयु तक वे समाज की सेवा में सक्रिय रहे। उनके निधन के साथ गोरखपुर की चिकित्सा सेवा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया।

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मुख्यमंत्री ने किया था 'गोरखपुर रत्न' से सम्मानित
सेवा काल के दौरान उन्होंने कभी अवकाश नहीं लिया। वह मरीजों से दूर तभी होते थे जब किसी कान्फ्रेंस में जाना होता था। सेवानिवृत्ति के बाद भी रिक्शा चालकों, रेलवे कुलियों, बेघर व असाहय लोगों को उनकी ओर से निश्शुल्क नेत्र चिकित्सा और दवाएं उपलब्ध कराई जाती रहीं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी वे मरीजों की स्थिति को लेकर अत्यंत चिंतित रहते थे।

स्वयं प्रत्यक्ष रूप से उनकी सेवा न कर पाने की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री आपदा राहत कोष में दो लाख रुपये का योगदान दिया। उनके असाधारण सामाजिक एवं परोपकारी कार्यों को सम्मान देते हुए वर्ष 2021 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें ‘गोरखपुर रत्न’ सम्मान से सम्मानित किया था।

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