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    Child Labour: पांच अंगुलियों से छह गिलास उठाने में खत्म हो रहा बचपन

    By Navneet TripathiEdited By: Pradeep Srivastava
    Updated: Wed, 16 Nov 2022 04:10 PM (IST)

    Child labour खेलने और पढऩे की उम्र में ही पांच अंगुलियों के बीच छह गिलास उठाने का हुनर सीखने में बचपन समय से पहले पीछे छूट जाता है। सुबह-सवेरे जब लोग सो रहे होते हैं ये बच्चे चाय की दुकानों और होटलों में कोयले की भट्ठियां धौंक रहे होते हैं।

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    Child Labour: चाय व होटलों में काम करने वाले बच्चे समय से पहले बड़े हो रहे हैं। - प्रतीकात्मक तस्वीर

    गोरखपुर, नवनीत प्रकाश त्रिपाठी। चाय की दुकानों और छोटे होटलों पर आमतौर से 'छोटू' के नाम से बुलाए जाने वाले उन बच्चों की उम्र 14 वर्ष से कम होती है, लेकिन प्रत्येक दिन वे 12 से 14 घंटे तक हाड़तोड़ मेहनत करते हैं। परिवार की आर्थिक दुश्वारियों की वजह से पढ़ने और खेलने की उम्र में ही चाय की दुकानों में पांच अंगुलियों से छह गिलास उठाने का हुनर सीख जाते हैं।

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    खेलने-पढ़ने की उम्र में खो जाता है बाल श्रमिकों का बचपन

    खेलने और पढऩे की उम्र में ही पांच अंगुलियों के बीच छह गिलास उठाने का हुनर सीखने में उनका बचपन न जाने कब पीछे छूट जाता है। सुबह-सवेरे जब लोग सो रहे होते हैं, ये बच्चे चाय की दुकानों और होटलों में कोयले की भट्ठियां धौंक रहे होते हैं। इसके बाद देर रात तक उनकी कड़ी मेहनत का सिलसिला जारी रहता है। बदले में उन्हें मिलती है दिन भर मालिक व ग्राहक हिकारत भरी डांट-फटकार और महीने के आखिर में कुछ सौ रुपये।

    बीमारियों और नशे का शिकार होना बन जाती है नियति

    छोटी उम्र में क्षमता से अधिक मेहनत करने के साथ ही पौष्टिक भोजन न मिलने की वजह से अधिकतर बाल श्रमिक, युवा अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते कई तरह की बीमारियों का शिकार बन जाते हैं। उन्हें आमतौर से नाक से जुड़ी बीमारी, सिरदर्द, अंधेपन का रोग हो जाता है। कई बाल श्रमिक थकान और फेफड़े तथा सांस संबंधी रोग के भी शिकार हो जाते है। उचित मार्गदर्शन और देखभाल के अभाव में अधिकतर बाल श्रमिक नशे के भी आदी हो जाते हैं। कम उम्र में ही शराब, सिगरेट और स्मैक पीने की उन्हें लत लग जाती है।

    कम खर्च, अधिक श्रम की वजह से बाल श्रमिकों को देते हैं काम

    बाल श्रम रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर से समय-समय पर अभियान चलाया जाता है। जिन दुकानों पर बाल श्रमिक पकड़े जाते हैं, उन दुकानदारों पर कार्रवाई भी होती है, लेकिन नियति के मारे बाल श्रमिक दोबारा उन्हीं दुकानों पर मजदूरी करने पहुंच जाते हैं। हालांकि दुकान पर दोबारा बाल श्रमिक पकड़े जाने पर दुकानदार के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई का कानून है, लेकिन कम खर्च अधिक श्रम मिलने की वजह से दुकानदार इस कानून की परवाह नहीं करते हैं।

    आर्थिक दुश्वारियों की वजह बाल श्रमिक बन जाते हैं बच्चे

    बाल श्रमिक निम्न आय वाले परिवारों से जुड़े होते हैं। परिवार की आर्थिक दुश्वारियां, खेलने और पढऩे की उम्र में उन्हें मजदूर बना देती है। आय का ठोस स्रोत न होने की वजह से ऐसे परिवारों के हर सदस्य का काम करना मजबूरी होती है। इसी मजबूरी की वजह से कम उम्र में बच्चे कठोर श्रम शुरू कर देते हैं। इसलिए इसे रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर ठोस पहल करनी होगी।

    बाल श्रम रोकने में आप भी करें सहयोग

    वैसे तो बाल श्रम रोकने को कड़े कानून बने हैं, लेकिन सामाजिक सहयोग के बिना इसे रोक पाना नामुमकिन है। बाल श्रम रोकने के लिए हर किसी को आगे आना होगा।

    किसी बच्चे को काम कतरे देखें तो उसकी व्यक्तिगत तौर पर यथा संभव मदद करें।

    उन दुकानों से कुछ भी न खरीदें जहां बच्चों से मजदूरी कराई जाती हो।

    बाल श्रम करवाने वालों का सामाजिक बहिष्कार करें।

    बाल मजदूरी रोकने के लिए सक्रिय संगठनों की मदद करें।

    अपने रिश्तेदारों और जानने वालों को भी इसके लिए प्रेरित करें।