गोरखपुर, प्रेम नारायण द्विवेदी। चौरीचौरा घटना की याद में 29 जुलाई 1990 को पहली बार चौरीचौरा एक्सप्रेस चली थी। यह ट्रेन इसी दिन पहली बार बड़ी लाइन पर वाराणसी के रास्ते गोरखपुर से इलाहाबाद जंक्शन तक चली थी। चौरीचौरा के बलिदानियों की याद में तीस साल से अधिक समय से यह ट्रेन आज भी निर्बाध गति से चल रही है। इस ट्रेन का मार्ग विस्तार कानपुर अनवरगंज तक हो गया, लेकिन नंबर 5003-5004 नहीं बदला। ट्रेनों का नंबर पांच अंक का हो जाने के बाद रेलवे प्रशासन आवश्यकतानुसार ट्रेन नंबर के आगे 1 या 0 लगाता रहता है।

बड़ी लाइन पर गोरखपुर से इलाहाबाद तक चलने वाली पहली ट्रेन बनी थी चौरीचौरा

जानकारों के अनुसार 29 जुलाई 1990 को वाराणसी में आयोजित समारोह में प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और तत्कालीन रेलमंत्री जार्ज फर्नांडीज ने आमान परिवर्तन (छोटी से बड़ी रेल लाइन) का लोकार्पण किया था। उनके कार्यक्रम के लिए प्रकाशित रेलवे के ब्रोसर में मुख्यमंत्री और रेलमंत्री के शुभकामना संदेश और इस ट्रेन को संचालित करने का उल्लेख है। बोसर के मुताबिक बड़ी लाइन पर चौरीचौरा के अलावा गोरखपुर से कृषक और दादर एक्सप्रेस का भी संचालन शुरू हुआ था। रेलवे का ब्रोसर आज भी पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्यालय गोरखपुर स्थित धरोहर कक्ष में सुरक्षित है। हालांकि, इस ब्रोसर के अलावा चौरीचौरा एक्सप्रेस को लेकर रेलवे के पास कोई दूसरा साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

तीस साल से अधिक समय से बलिदानियों की याद में चल रही चौरीचौरा एक्सप्रेस

दरअसल, पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य मार्ग बाराबंकी-गोरखपुर-छपरा-बरौनी का आमान परिवर्तन वर्ष 1981 में ही पूरा हो गया था। इस रेलमार्ग पर बड़ी लाइन वाली एक्सप्रेस ट्रेनें चलने लगीं। लेकिन भटनी-वाराणसी रेलमार्ग पर छोटी रेललाइन ही थी।

वाराणसी और इलाहाबाद जाने वाले गोरखपुर के यात्रियों को भटनी में ट्रेन बदलनी पड़ती थी। तब भटनी-वाराणसी तक 161 किमी रूट पर छोटी लाइन की त्रिवेणी एक्सप्रेस चलती थी। हालांकि, 5 अप्रैल 1980 को भटनी-वाराणसी 161 किमी रेल लाइन का आमान परिवर्तन के लिए शिलान्यास हो गया था। 20 मई 1990 को आमान परिवर्तन का कार्य पूरा हो गया। यहां जान लें कि चौरीचौरा की घटना और बलिदानियों की याद में चौरीचौरा जनक्रांति शताब्दी समारोह वर्ष मनाया जा रहा है।  

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