देवेंद्र जायसवाल सोनू

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जासं, सैदपुर (गाजीपुर) : सुपरहिट फिल्म बाहुबली फिल्म की कहानी वास्तव में गुप्तवंश के पराक्रमी राजा स्कंदगुप्त व उनके चचेरे भाई पुरुगुप्त की है। इस कहानी को निर्देशक ने तोड़ मरोड़कर पेश किया है। शनिवार को विदेशी इतिहासकारों के साथ भितरी स्थित स्कंदगुप्त के विजय स्तंभ पर आए बीएचयू के अध्ययन कला विभाग में इतिहासकार के प्रोफेसर राकेश उपाध्याय ने यह बातें 'दैनिक जागरण' से साझा की। राकेश उपाध्याय ने स्कंदगुप्त के जीवनी के बारे में चर्चा करते हुए बताया कि स्कंदगुप्त की माता विमाता थी। कुमार गुप्त के छोटे पुत्र स्कंदगुप्त का बड़ा भाई पुरुगुप्त थे। संभवत: पिता कुमार गुप्त की मौत के बाद राजगद्दी पर पुरु गुप्त का हक था, लेकिन स्कंदगुप्त के पराक्रम व वीरता को देखते हुए उन्हें राजगद्दी मिल गई। यह बात पुरु गुप्त को बुरी लगी। संभवत: स्कंदगुप्त की मृत्यु के बाद पुरुगुप्त ने राजगद्दी पर कब्जा कर लिया था। खोदाई के दौरान भितरी में मिले सोने के सिक्के पर कुमार गुप्त व पुरु गुप्त का तो नाम दर्ज है लेकिन स्कंदगुप्त का नाम नहीं है। इससे यह पता चलता है कि पुरुगुप्त अपने भाई स्कंदगुप्त से ईष्या रखता था। यही वजह है कि सिक्कों पर उनका नाम तक अंकित नहीं करवाया था। स्कंदगुप्त का पूरा जीवन संघर्षों में बीत गया था। उन्होंने हुणों व पुष्पमित्रों की बर्बरता से देश को बचाया था। इसी कहानी को बाहुबली फिल्म में तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है। फिल्म में पाटलीपुत्र समेत स्कंदगुप्त से जुड़े अन्य जगहों की भी चर्चा की गई है। फिल्म में जिन्हें पिडारी बताया गया है वही हुण थे, जिन्हें स्कंदगुप्त ने परास्त किया था। फिल्म में स्कंदगुप्त को अमरेंद्र बाहुबली व पुरुगुप्त को भल्लालदेव के रूप में दिखाया गया है।

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