ठुमरी में पिरोए शब्दों की 'मोती'
- ललन पिया की जयंती कल - ठुमरी पर किया जाएगा शोध फर्रुखाबाद, जागरण संवाददाता : 'नई नारि नयो रंग
- ललन पिया की जयंती कल
- ठुमरी पर किया जाएगा शोध
फर्रुखाबाद, जागरण संवाददाता : 'नई नारि नयो रंग ढंग छल बल षों, देखो आई रंगीली रसीली छवि' या फिर हो 'ऐसो होरी को खिलैया मुरारी नटखट, ठाड़ो बंसी वट तरु जमुना के निकट'। फर्रुखाबाद में जन्मे ठुमरी सम्राट ललन पिया की बंदिश की ठुमरी की यह विशेषता है कि अति द्रुत गति में गाने पर भी राग का स्वरूप नहीं बिगड़ता। उनकी घनाक्षरी बंदिशों में शब्द इतने अधिक घने हैं जैसे माला में मोती पिरोए गए हों। शहर के लिए यह गौरव की ही बात है कि अब बनारस घराने के मशहूर गायक पदमश्री पंडित छन्नूलाल मिश्र की शिष्या व संगीत नाटक अकादमी नई दिल्ली की कलाकार डा. कुमुद दीवान ललन पिया की ठुमरी पर शोध करेंगी और नई पीढ़ी को उनकी रचनाओं और गायन से परिचित कराएंगी।
1850 में भाद्रपद ऋषि पंचमी को फर्रुखाबाद के मित्तूकूंचा में जन्मे नंदलाल सारस्वत संगीत की दुनिया में 'ललन पिया' के नाम से विख्यात हुए। मंगलवार को उनकी जयंती है। उन्होंने बोल-बांट की अपनी शैली में ठुमरियों को बोल और तरकीब को ऐसी तिहाइयों से सजाया कि गायक व तबला वादक के बीच होने वाली संगीत की झंकार श्रोताओं को आनंद से सराबोर कर देती। उनकी ठुमरियों में साहित्य व संगीत का सुंदर मिश्रण है। 1926 में मृत्यु होने तक उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। 30 से अधिक पुस्तकें मुंशी नवल किशोर प्रेस लखनऊ से प्रकाशित हुईं। ठुमरी लेखन व गायन के साथ-साथ उन्होंने गजल, गीत, छंद, कवित्त, दोहा, भजन, ध्रुपद व लोकगीत की रचना की।
ललन पिया हाजी विलायत अली संगीत अकादमी के अध्यक्ष डा. कंचन मिश्र व संगीत संयोजक विद्याप्रकाश दीक्षित का कहना है कि डा. कुमुद दीवान द्वारा क्रियात्मक शोध किए जाने से ललन पिया की ठुमरियों को नए दौर में नया मुकाम मिल सकेगा।
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