फैजाबाद : गांव हो या शहर, श्रावण मास में खेले जाने वाले परंपरागत खेल सिकड़ी और सुर्र विलुप्त होते चले जा रहे हैं। ग्रामीण परिवेश के खिलाड़ी दिनेश कुमार कहते हैं कि इन खेलों से एक ओर जहां लोगों को मनोरंजन का एक विकल्प मिलता था, वहीं दूसरी ओर अलग से व्यायाम करने की जरुरत नहीं पड़ती थी। इन खेलों से वे सभी व्यायाम हो जाते है जिनकी व्यक्ति को आवश्यकता होती है। अतीत में झांक कर देखा जाए तो पता चलता है कि सावन के शुरू होते ही पेड़ों पर झूले पड़ जाया करते थे। गांव के खेत-खलिहानों में सुर्र और सिकड़ी के मैदान तैयार हो जाते थे। किसान शिवनाथ सिंह बताते हैं कि सुर्र पुरुषों का तो सिकड़ी महिलाओं का प्रचलित खेल था। अब क्या शहर और क्या गांव, सिकड़ी और सुर्र का वजूद ही नहीं दिखायी दे रहा है। आज की पीढ़ी इन खेलों के नाम से भी वाकिफ नहीं है। वे कहते हैं कि पहले लोगों को सावन के आने का इंतजार रहता था। सावन में पेड़ों की डालियों पर पड़ने वाले झूले और उस पर सावन के गीतों को गुनगुनाते हुए झूलने वाले लोगों से सौहार्द का संदेश तो गूंजता ही था, सम्पूर्ण वातावरण प्रफुल्लित बन जाता था। शहर में तो झूला झूलने की परंपरा ही गायब होती जा रही है। उत्साह और उमंग के साथ खेले जाने वाले इन खेलों का भी नाम लेवा नही रह गया है। पुराने खिलाड़ी मोहन सिंह कहते हैं कि सुर्र खेल में जब खिलाड़ी को छकाने के लिए पाले में उतरा जाता था, तो खेल खत्म होने के बाद पसीना बहाए खिलाड़ी सावन की मद-मस्त हवाओं से आनंद उठाते थे। वे कहते हैं कि अब तो कब सावन आया और कब चला गया, पता ही नहीं चलता है। हां, वे इतना जरुर कहते हैं कि अयोध्या का पारंपरिक सावन झूला मेला न हो तो लोगों को सावन के आने का एहसास ही न हो। खेलों की बात तो दूर की रही। जबकि सावन के आते ही इन खेलों से खेत खलिहान व मैदान गमक उठते थे।