अयोध्या : निर्मोही अखाड़ा का रानी लक्ष्मीबाई से गहन सरोकार रहा है। ग्वालियर स्थित स्वर्णरेखा नदी के किनारे स्थित जिस स्थल पर रानी ने 1857 में अंतिम सांस ली थी, वह उनके गुरु और निर्मोही अखाड़ा के यशस्वी संत गंगादास की कुटिया थी। ऐतिहासिक विवरण के अनुसार रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से निर्णायक लड़ती हुईं ग्वालियर पहुंची थीं। उन्होंने ग्वालियर पर विजय प्राप्त की और अपना लश्कर स्वर्णरेखा नदी के किनारे गुरु के आश्रम के करीब ही स्थापित किया।

रानी विजय की खुशी भी नहीं मना पाई थीं कि अंग्रेजों ने उनके ऊपर आक्रमण कर दिया। अचानक हुए इस आक्रमण में रानी घायल हो गईं। इस जख्म से वे उबर नहीं सकीं और जल्दी ही उन्होंने अंतिम सांस ली। रानी यह नहीं चाहती थीं कि उनका शरीर अंग्रेजों के हाथ लगे और इसी चाहत के अनुरूप उन्होंने गुरु गंगादास से वचन लिया। गुरु ने शिष्या को दिया वचन पूर्ण करने के लिए अखाड़ा के 1200 साधुओं के साथ स्वयं को दांव पर लगा दिया। दूसरी ओर अंग्रेज सेना रानी लक्ष्मीबाई को जिदा या मुर्दा पकड़ने के लिए पूरी ताकत झोंक रही थी। अखाड़ा के साधु इस संघर्ष में बीच रानी की पीठ पर बंधे उनके पुत्र को सुरक्षित ठिकाने के लिए रवाना कर रानी का अंतिम संस्कार करने में लगे थे। गंगादास ने सामरिक परिस्थितियों की शीघ्रता के अनुरूप अपनी कुटिया को ही गिराकर चिता बना दी और रानी का वैदिक विधि-विधान से अंतिम संस्कार किया।

इस दौरान हुए युद्ध में अखाड़ा के 745 साधुओं को प्राणों की आहुति देनी पड़ी। जो बाकी बचे, उन्हें लेकर गंगादास ग्वालियर से बाहर चले गए। कुछ दिनों बाद शांति स्थापित होने पर वे वापस लौटे और आश्रम को फिर से स्थापित करने के साथ रानी की समाधि भी बनवाई। यह विरासत निर्मोही अखाड़ा से जुड़े साधुओं को गौरवांवित करने के साथ उनमें राष्ट्रीयता के प्रबल अनुराग का भी संचार करती है। निर्मोही अखाड़ा के पंच एवं पौराणिक महत्व की स्थानीय पीठ नाका हनुमानगढ़ी के महंत रामदास भी इन्हीं में से एक हैं। मंगलवार को रानी का 162वां बलिदान दिवस मनाने के साथ उन्होंने नाका हनुमानगढ़ी परिसर में लक्ष्मीबाई के नाम से शक्ति स्मारक निर्मित कराने का संकल्प लिया। इस मौके पर नगर निगम के आयुक्त नीरज शुक्ल एवं सहायक नगर आयुक्त सच्चिदानंद सिंह भी मौजूद रहे।

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Edited By: Jagran