विजय प्रताप सिंह चौहान, इटावा

हिंदी मंचों पर कविता को स्थापित करने वालों में शिशुपाल सिंह 'शिशु' बलवीर सिंह रंग, गोपाल सिंह नेपाली आदि कवियों का नाम लिया जाता है। 'शिशु' जी जनकवि थे। वे इटावा के पहले ऐसे कवि थे जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। उनकी कविताओं की लगभग दस पुस्तकें दक्षिण भारत से प्रकाशित हुई। इटावा जनपद में पहली बार राष्ट्रपति पुरस्कार उन्हें 1962 में मिला। विशेष बात यह है कि यह सम्मान इसी वर्ष से शुरू हुआ था। इसके लिए पूरे प्रदेश से एक ही व्यक्ति को चुना जाता था। यह सम्मान पाने वाले 'शिशु' पहले व्यक्ति बने। उनकी नीरजा, यमुना किनारे, हल्दीघाटी की एक रात, पूर्णिमा, दो चित्र आदि देश विख्यात कृतियां हैं। उनकी पनघट व मरघट रचनाएं तो इतनी व्यावहारिक हैं कि आज भी लोग उन्हें सुनकर या पढ़कर जीवन दर्शन के इतने करीब पहुंच जाते हैं जितना भागवत और रामायण सुनकर भी नहीं पहुंचते। मरघट की एक पंक्ति, 'नाड़ी छूट गई तो भैया मरघट को ले आये', आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। आज जनपद के बहुत कम लोग उनके नाम से परिचित हैं।

आज शिशुपाल सिंह 'शिशु' की पुण्य तिथि है। उदी के ठाकुर बिहारी सिंह भदौरिया के पुत्र के रूप में 9 सितंबर 1911 में जन्मे इस कालजयी रचनाकार और शिक्षक की आज ही के दिन अर्थात 27 अगस्त 1964 को सर्पदंश से मृत्यु हो गई थी। जनपद के विख्यात कवि और साहित्यकार डा. कुश चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्होंने थियोसोफीकल मांटेसरी स्कूल में न्यायमूर्ति प्रेम शंकर गुप्ता को पढ़ाया। बाद में वे उदी स्थित प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक बन गए थे। देश का पहला राष्ट्रपति पुरस्कार जनपद को दिलाने वाले 'शिशु' का आज कोई पुरसाहाल नहीं है। उनके नाम पर जनपद में कोई सड़क, कोई कॉलोनी, कोई पार्क या कोई स्मारक नहीं है। आखिर क्या वजह है इस अनदेखी की?

'शिशु' की उपेक्षा तो की ही गई, राजनीति करने वालों ने भी उन्हें प्रयोग की वस्तु से ज्यादा कभी कुछ नहीं समझा। यही कारण है कि राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजे गए इस महान कवि की एक आदमकद मूर्ति को आज तक स्थापित करने के लिए दो फुट जगह भी मयस्सर न हो सकी। शिशुपाल सिंह 'शिशु' के पुत्र कृष्णपाल सिंह ने लगभग बारह साल पहले अपने पिता की धातु की एक मूर्ति बनवाई थी। दरअसल 1970-71 में शिशु स्मारक समिति बनाई गई जिसका अध्यक्ष तत्कालीन डीआईओएस शिवदत्त त्रिवेदी को बनाया गया था। इस मूर्ति के लिए उस समय इटावा के सभी विद्यार्थियों ने एक-एक रुपया जमा किया था। परिवर्तन समिति के सचिव संजय सिंह ने बताया कि उनकी संस्था में उपलब्ध 'शिशु' की कई कृतियां उपलब्ध हैं जिसे वे लोगों के मांगने पर मुहैया कराते हैं।

शिशु स्मृति में किए गए कार्य

तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष कृष्ण लाल जैन ने पहली बार शिशु जी का सार्वजनिक अभिनंदन कौमुदी महोत्सव के नाम से किया था। इस मौके पर विश्वनाथ भटेले के संपादन में शिशु अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित हुआ। बाद में इटावा हिंदी सेवा निधि ने डा. कुश चतुर्वेदी के संपादन में शिशु बल्लभ ओजस्विनी का प्रकाशन किया। इसके बाद शिशु स्मारक समिति ने एक समीक्षापरक शिशु स्मृति ग्रंथ प्रकाशित किया जिसका प्रबंध संपादन श्याम मुरारी दीक्षित ने किया।