धतूरा : जड़ से तना तक औषधि युक्त
चंदौली : सावन के महीने में भगवान शिव को चढ़ने वाला धतूरा वर्तमान में हमसे दूर होता जा रहा है। आलम यह है कि कल तक घर बाहर यहां तक कि चारों तरफ दिखने वाला धतूरा अब बहुत ढूंढ़ने के बाद भी नहीं मिल पाता।
धतूरा के बारे में कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय वा खाये बौराए जग वा पाए बौराय.। जैसे मुहावरे भी कहे गए हैं। कनक सोना को भी कहते हैं और धतूरा को भी कहा जाता है। अत्यधिक सोना(आभूषण) पाने से और धतूरा को खाने से व्यक्ति विक्षिप्त सा हो जाता है।
धतूरा वह पौधा है जो जड़ से लेकर तना तक औषधि गुणों से परिपूर्ण है। समय चक्र के आगे यह विलुप्ति के कगार पर है। कभी अत्यधिक संख्या में घर के आस पास व जंगलों की शोभा बढ़ाने वाला धतूरा बड़े ही आसानी से दिख जाता था। पर अब ऐसा नहीं है। सावन के महीने में इन दिनों इसको ढूंढ पाना मुश्किल हो गया है। आयुर्वेद पद्धति में धतूरा का बड़ा महत्व है। औषधि गुणों की खान माने जाने वाले धतूरा की जड़, फल, फूल, पत्ता औषधियुक्त हैं। इसके पत्ते को पीसकर पैर में सूजन हो जाने पर काफी उपयुक्त माना जाता है। स्वांस रोग में भी यह लाभदायक होता है। जोड़ों के दर्द में यह लाभकारी है। गर्मी के दिनों में इस पौधे में फूल लगना शुरू हो जाता है। आयुर्वेदाचार्य श्यामधर शरण वैद्य कहते हैं कि बुखार, सायटिका, गठिया, वायु आदि तमाम रोगों में धतूरा का शोधन कर बनाई गई दवा रोगों से मुक्ति देती है।
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