व्यक्तित्व की छाप नैतिक मूल्यों की आधारशिला
आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला एवं माता उसकी प्रथम शिक्षिका होती हैं। प
आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला एवं माता उसकी प्रथम शिक्षिका होती हैं। परिवार के सदस्यों की आदतों के अनुकरण द्वारा बालक पारिवारिक वातावरण को धारण करता है। इस तरह यहीं से उसके संस्कारों की नींव पड़ती है जो उपलब्धि जाहिरन उसे विरासत या धरोहर के रूप में प्राप्त होती है।
माता-पिता तथा गुरु के ऋण को कभी चुकाया नहीं जा सकता। घर पर आया मेहमान देवतुल्य होता है। अपने छोटों के प्रति क्षमा, प्रेम एवं भातृत्व जैसे व्यवहार का निर्वहन व्यक्ति को उच्चता प्रदान करता है। भौतिकता की चकाचौंध और अंधानुकरण की अंधी दौड़ के कारण अनैतिकता को बढ़ावा मिल रहा है। आज लोगों का ज्ञान तो बढ़ रहा है लेकिन चारित्रिक एवं नैतिकता का पतन हो रहा है। आपसी विश्वास व निष्ठा की कमी के कारण संयुक्त परिवार टूटकर एकल में परिवर्तित हो रहे हैं। और वहां भी शांति व खुशहाली का नितांत अभाव पाया जा रहा है। आज शिक्षा का उद्देश्य पढ़-लिखकर धन कमाना हो गया है। वह चाहे जैसे भी हो। इसी कारण ईमानदारी एवं सत्यनिष्ठा, परोपकार की कमी तथा स्वार्थ, बेईमानी, धन-लोलुपता को बढ़ावा मिल रहा है। व्यक्ति अपने कर्तव्यों को भूलता जा रहा है। अनैतिकता को बढ़ावा दिया जा रहा है। मनुष्य अपने मूल उद्देश्यों से भटका नजर आ रहा है। धन व शक्ति के अधिकतम अर्जन की लालसा मनुष्य को पथभ्रष्ट बना रही है। इसी कारण अपराध का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। अनैतिक एवं चरित्रहीन मनुष्य अपने तथा समाज के लिए घातक होता है। इसलिए बचपन से ही बालक के व्यक्तित्व में ईमानदारी, सत्य-निष्ठा, आत्म-नियंत्रण, विश्वसनीयता, कर्मशीलता, सहनशीलता, उत्तरदायित्व जैसे अच्छे संस्कारों की नींव डालने में प्रत्येक व्यक्ति तथा समाज की जिम्मेदारियों का निर्वहन सतर्कता पूर्वक करना होगा। जो समाज एवं राष्ट्र की दशा एवं दिशा तय करते हैं। हमारा देश सांस्कृतिक विविधताओं वाला देश है जिसमें अनेक जाति-धर्म के लोग अपनी-अपनी सभ्यता एवं संस्कृतियों के अनुरूप नैतिक एवं मानवीय मूल्यों का पोषण करते हैं। सभी यह मानते हैं कि नैतिकता ऐसा मरहम है जो मानवता के घावों को भरता है। जीवन मूल्यों की रक्षा नैतिक मूल्यों के द्वारा ही संभव है।
हमारे समाज के लोग नैतिकता का पाठ तो पढ़ाते हैं ¨कतु स्वयं अनैतिक आचरण के शिकार हैं। इनकी कथनी एवं करनी में अंतर पाया जाता है। चाहे वह शिक्षक हो या फिर माता-पिता व अन्य बड़े लोग, आदर्श की बातें करते तो नहीं थकते ¨कतु उनका स्वयं का आचरण ¨नदनीय होता है। ऐसे ही व्यक्तित्वों के अनुकरण से ही नई पीढ़ी में भी दोहरे व्यक्तित्व का निर्माण होता है जो भविष्य में अनैतिक आचरण को बल देता है। समाज में प्रचलित नैतिक मूल्यों की प्रकृति अमूर्त होती है जिसका संबंध मानव की आंतरिक शक्ति व मन से होता है। व्यक्ति को वही व्यवहार करना चाहिए जो समाज द्वारा स्वीकृत तथा मानवीय मूल्यों पर आधारित हों। हमें यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए जो आचरण हम दूसरों के साथ अपना रहे हैं कहीं उसे आघात तो नहीं पहुंचा रहे हैं। हमें अपने कर्तव्य व दायित्वों का बोध होना चाहिए जिससे समाज का मार्गदर्शन कर अच्छे नागरिक बनने का गौरव प्राप्त हो सके।
चित्र.8.- डा. लोकपति त्रिपाठी, असिस्टेंट प्रोफेसर काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, ज्ञानपुर।
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निष्ठा में कमी से हो रहा भटकाव
- देश, समाज व मानवता के प्रति निष्ठा में कमी के चलते लोग भटकाव के शिकार हो गए हैं। इसी निष्ठा की कमी के चलते लोग नैतिकता व अनैतिकता में भेद नहीं कर पा रहे हैं। अच्छे संस्कार से ही व्यक्तित्व में निखार आता है। सांस्कारिक व्यक्ति ही एक उन्नत समाज व राष्ट्र के निर्माण करने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकता है। इसलिए प्रत्येक बच्चे में माता-पिता व गुरु को अच्छे संस्कारों की नींव डालनी चाहिए ताकि वह नैतिकता के उच्चतम मानदंड छू सके। मनुष्य के अच्छे कार्य व व्यवहार से ही उसे शिष्ट अथवा अशिष्ट की संज्ञा दी जाती है। आज के दौर में एक दूसरे के प्रति सहयोग, समर्पण व त्याग की कमी के चलते ही बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो रही है। लोग एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। भौतिकता की अंधी दौड़ के चलते भी अनैतिकता को बल मिल रहा है। लोग अपने कर्तव्यों को भूल पथभ्रष्ट हो रहे हैं। यही कारण है कि आज समाज में विद्वेष की भावना भर चुकी है। लोगों की निष्ठा परिवर्तित हो चुकी है।
- चित्र.9.रजनीश पाठक, शिक्षक
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सांस्कृतिक धरोहरों को रखें सहेज कर :
विश्व के सभी देशों की अपनी अलग सभ्यता-संस्कृति है। यही लोक परंपरा व सांस्कृतिक मूल्य उनकी धरोहर हैं। इसी के आधार पर वहां के लोग अपने परिवार, समाज व देश की पहचान बनाने में सहायक होते हैं। सभी को अपने इतिहास व सभ्यता पर तभी गर्व करने का अवसर मिलता है, जब वह उसके प्रति निष्ठावान होकर, नैतिक व अनैतिक में विभेद कर तथा अपने कार्यो से मानव मूल्यों के उच्चतम मानदंडों को प्रतिष्ठापित करते हैं। जब किसी के प्रति व्यक्ति निष्ठावान होता है तो उसके प्रति अपने किए गए कार्यों से नैतिकता की ओर अग्रसर होता है। जब निष्ठा में ह्रास होने लगता है तब उसके नैतिक मूल्यों में भी गिरावट आनी शुरू हो जाती है। वह भ्रष्टाचार को उचित समझने लगता है। छोटी-छोटी लोभ के चलते समाज में तरह-तरह की बुराइयां जन्म लेने लगती है। उन्हीं के चलते समाज में एक-दूसरे के प्रति कटुता व विद्वेश की भावना पनपने लगती है जो आगे चलकर समाज व देश को कलंकित करते हैं। दूसरी तरफ जब देश के लोग अपने कर्तव्यों व दायित्वों के प्रति निष्ठावान होते हैं तब अपने नैतिक मूल्यों के चलते नैतिकता का उच्च मापदंड स्थापित कर देश व समाज का गौरव बढ़ाते हैं।
चित्र.10.देवेंद्र कुमार तिवारी, शिक्षक
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नैतिक मूल्यों की हो स्थापना
नैतिकता से ही व्यक्ति में सद्गुणों का विकास होता है। आज के दौर में लोग नैतिकता छोड़ गलत रास्ते पर चल पड़े हैं। इसी के चलते लोगों में समाज व देश में तमाम दुर्गुण पनप रहे हैं। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को नैतिक मूल्यों को बचाए रखने में सहायक बनना चाहिए।
चित्र.11.हितेश कुमार, छात्र
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संस्कारों से बनती है पहचान
अच्छे संस्कार के चलते ही व्यक्ति गुणवान बनता है। संस्कारों के चलते ही व्यक्ति समाज में एक आदर्श स्थापित कर अपनी अलग पहचान बनाता है। आगे चलकर उसके द्वारा स्थापित किए गए उच्च मानव मूल्यों को अपना आदर्श समझ लोग उसे प्राप्त करने की कोशिश करती है।
चित्र.12.कन्हैया शुक्ला, छात्र
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सामाजिक बुराइयां दूर हों
आज समाज में तमाम कुरीतियां फूल-फल रही हैं। लोगों में नैतिकता की कमी के चलते इसको दिन-प्रतिदिन बढ़ावा मिल रहा है। इससे न तो देश का और न समाज का ही भला हो रहा है। हम सभी को आगे बढ़कर इसे रोकने व खत्म करने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए।
चित्र.13.अन्नू दुबे, छात्र
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निष्ठापूर्वक करें कर्तव्यों का पालन
लोगों को अच्छे कार्यों के प्रति प्रेरित करने के लिए हमें अपने देश व समाज के प्रति निष्ठावान बनना होगा। इसके लिए आवश्यक है कि हम सभी को पूरी निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। यदि हम स्वयं किसी कार्य को निष्ठापूर्वक करते हैँ तभी दूसरे लोग उस कार्य के प्रति प्रेरित होते हैं।
चित्र.14.ऊदल ¨बद, छात्र
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प्रेम-भावना बढ़ाता है परोपकार
जिस प्रकार आज लोगों के मन से परोपकार की भावना दूर हो रही है वह एक स्वच्छ समाज की स्थापना के लिए अच्छे लक्षण नहीं है। जब तक हम एक-दूसरे के प्रति परोपकार की भावना नहीं रखेंगे तब तक हमारे मन में प्रेम का वास नहीं होगा। परोपकार से न सिर्फ आपस में प्रेम भाव बढ़ता है बल्कि लोगों के समक्ष हमारी एक अच्छी पहचान भी बनती है।
चित्र.15.टल्लू शुक्ला। छात्र
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