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    ऋषियों की तपोभूमि है बस्ती का मखौड़ा धाम, त्रेता युग में यज्ञ के लिए चुना गया ये स्थान; भगवान राम से जुड़ा है रहस्य

    By Jagran NewsEdited By: Pragati Chand
    Updated: Sun, 29 Oct 2023 01:17 PM (IST)

    बस्ती का मखौड़ा धाम ऋषियों की तपोभूमि है। त्रेता युग में इस स्थान को यज्ञ के लिए चुना गया था। मान्यता है कि अग्र पूजन का धाम होने के साथ ही जनपद सबसे गौरवशाली पौराणिक स्थलों में सबसे प्रमुख है। यहां हरैया से परशुरामपुर होकर साठ किमी दूरी तय कर पहुंचा जा सकता है। अयोध्या से दूरी बीस किमी है।

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    बस्ती के मखौड़ाधाम में निर्माणाधीन मंदिर। - जागरण

    बस्ती। बस्ती जिले का मखक्षेत्र यानी मखौड़ा धाम गौरवशाली स्थलों में प्रमुख है। यह ऋषियों की तपोभूमि है। त्रेता युग में ऋषियों ने इस स्थान को यज्ञ और धात्मिक अनुष्ठान के लिए सर्वोत्तम भूमि में चुना था। ऐसा तब हुआ जब कोशल नरेश महाराज दशरथ जी को उम्र के चौथेपन तक संतान उत्पत्ति नहीं हुई तो समूचे राजपरिवार के साथ राजगुरु व ऋषि, मुनियों के साथ प्रजा भी चिंतित रहने लगी। जब कोशल नरेश ने यह चिंता कुलगुरु वशिष्ठ जी को बताई तो उनके द्वारा उन्हें पुत्र कामेष्ठि यज्ञ संपन्न कराने की सलाह दी गई। उस समय ऋषियों द्वारा किए जा रहे याज्ञिक अनुष्ठान, तपस्या, साधना में दानवों द्वारा खलल डालने का कार्य किया जाता था। जब त्रेता युग में देश की सीमा मंगोलिया तक फैली थी।

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    ऋषियों ने इस विशेष यज्ञ के लिए पावन भूमि की खोज शुरू की, जो मखक्षेत्र में आकर समाप्त हुई। कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ जी व विश्वामित्र जी द्वारा इसे अनुष्ठान के लिए सर्वोत्तम भूमि शोधन करने के बाद बताए जाने पर यज्ञ की तैयारी शुरू हुई। अब दूसरी बड़ी समस्या पवित्र जल जिसके आचमन से यज्ञ संपन्न हो उसकी आई। जिस पर गुरु वशिष्ठ ने महाराज दशरथ को सलाह दी कि इस समय यज्ञ भूमि के सन्निकट अब गोंडा जनपद स्थित जंगल में तिर्रे तालाब पर महर्षि उद्दालक जी तपस्या रत है। आप उनकी शरण में जाएं तो निदान अवश्य होगा।

    कोशल नरेश के अनुनय- विनय पर प्रसन्न होकर ऋषि ने तालाब से अपनी तर्जनी उंगली से एक रेखा खींची, जिसे मनोरामा नदी के रूप में मान्यता मिली। इसी कारण इसे गंगा की सातवीं धारा व उद्दालिकी गंगा नाम से पुराणों में स्थान मिला। यहां पर यज्ञ संपन्न होने के बाद प्राप्त हव्य यानी प्रसाद को तीनों रानियों को समान भाग में सेवन के लिए बांटा गया। जिसमें से एक तिहाई हव्य का अंश महारानी कौशल्या, कैकई ने अपने से छोटी रानी सुमित्रा को छोटी बहन के रूप में दिया। जिसके फलस्वरूप महारानी कौशल्या जी से राम व कैकई जी से भरत तथा हव्य का ज्यादा हिस्सा सेवन करने के सुमित्रा जी से लक्ष्मण व शत्रुध्न जी का जन्म हुआ। आज लोग पुत्र की कामना लेकर अनुष्ठान करने यहां देश के कोने- कोने से आते हैं।

    ऐसी मान्यता है कि अग्र पूजन का धाम होने के साथ ही जनपद सबसे गौरवशाली पौराणिक स्थलों में सबसे प्रमुख है। यहां हरैया से परशुरामपुर होकर साठ किमी दूरी तय कर पहुंचा जा सकता है। अयोध्या से दूरी बीस किमी है। परसा- परशुरामपुर रोड पर उत्तर दिशा में प्राचीन मंदिर के अवशेष स्वरूप पुराना मंदिर है। नए मंदिर का निर्माण अंतिम चरण में है।

    वर्तमान सरकार द्वारा इसके पौराणिक महत्व को देखते हुए श्रीराम सर्किट योजना में शामिल किया गया है। प्रदेश सरकार द्वारा इसे पयर्टक स्थल घोषित करने के बाद तमाम सौंदर्यीकरण की योजनाओं पर भी काम चल रहा है। इसके चलते बस्ती जनपद को देश ही नही विदेशों में भी पहचान मिल रही है। सभाराज सिंह, अवकाश प्राप्त अधिकारी भारतीय प्रशासनिक सेवा ( आइएएस) निवासी ग्राम गढ़ा गौतम, बस्ती।