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    ICMR Report : डिपार्टमेंट ऑफ सोशल एंड बिहेवरियरल रिसर्च आइसीएमआर की बोली रिपोर्ट, कोरोना काल में मानसिक रूप से परेशान हुए ‘धरती के भगवान’

    ICMR Report ‘धरती के भगवान’ यानी डाक्टर हों या फिर अन्य स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अन्य कर्मचारी... वैसे तो हर दिन इनके लिए नई चुनौतियां लेकर आता है। जिनसे निबटने के लिए ये काफी हद तक तैयार रहते है।

    By Ravi MishraEdited By: Updated: Sun, 19 Sep 2021 09:47 AM (IST)
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    ICMR Report : डिपार्टमेंट ऑफ सोशल एंड बिहेवरियरल रिसर्च आइसीएमआर की बोली रिपोर्ट

    बरेली, दीपेंद्र प्रताप सिंह। ICMR Report : ‘धरती के भगवान’ यानी डाक्टर हों या फिर अन्य स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े अन्य कर्मचारी... वैसे तो हर दिन इनके लिए नई चुनौतियां लेकर आता है। जिनसे निबटने के लिए ये काफी हद तक तैयार रहते है। लेकिन कोरोना संक्रमण के पिछले डेढ़ साल कुछ ऐसे बीते कि डाक्टर समेत अधिकांश स्वास्थ्यकर्मियों को ही काफी हद तक बीमार कर दिया। खासकर एक के बाद एक कई डाक्टर व अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की कोरोना संक्रमण से मौत ने इन्हें भी शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद कमजोर कर दिया।

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    इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) में डिपार्टमेंट आफ सोशल एंड बिहेवियरल रिसर्च की विभागाध्यक्ष रहीं डा.बीना ई थामस के नेतृत्व में हाल में एक अध्ययन हुआ है। इसकी रिपोर्ट इंडियन जनरल आफ मेडिकल रिसर्च (आइजेएमआर) में 16 सितंबर को प्रकाशित की गई है। बरेली जिला अस्पताल के मनकक्ष में भी कई स्वास्थ्यकर्मियों और खासकर महिलाओं ने बेहद मुश्किल चुनौती की बात स्वीकारी। अध्ययन में संगठनात्मक, सामाजिक और व्यक्तिगत स्तरों पर बहिष्कार जैसे हाल भी शामिल हैं।

    कार्यस्थल के दबाव और परिवार की चिंता का दोहरा असर 

    अध्ययन में पाया कि स्वास्थ्यकर्मियों की मानसिक परेशानी का सबसे बड़ा कारण कोरोना संक्रमण काल में कार्य स्थल पर दबाव और परिवार की चिंता रही। कार्यस्थल पर चार तरह की दिक्कत हुईं। इसमें काम का ओवरलोड, अनियमित ड्यूटी, पीपीई किट पहनकर घंटों काम करना और खुद संक्रमित होने का डर सबसे ज्यादा था। वहीं अधिकांश ने बताया कि परिवार को संक्रमण मुक्त रखने के लिए कई दिनों या महीनों तक क्वारंटाइन के रूप में अलग रहना पड़ा। इससे बच्चों व स्वजन पर असर पड़ा ही, कई जगह कालोनी या मुहल्ले में लोगों ने संक्रमण के डर से इनसे दूरी बना ली। अफवाह भी फैलाई। इस उपेक्षापूर्ण व्यवहार का काफी मानसिक असर पड़ा।

    स्टाफ को एक-दूसरे का ही मिला सहारा 

    खानपान और दिनचर्या बदलने से स्वास्थ्यकर्मियों की नींद बिगड़ गई। अगले दिन की ड्यूटी को लेकर भी दहशत थी। सपोर्ट केवल चार चीजों का था। हां, इस दौरान साथ काम करने वाले ही एक-दूसरे को धैर्य बंधाते थे। अध्ययन में डाक्टरों समेत स्वास्थ्यकर्मियों ने कुछ राय भी रखी हैं। इनमें काम के लिए बेहतर माहौल, सपोर्ट ग्रुप और काउंसिलिंग बढ़ाने की जरूरत। मीडिया में सकारात्मक कवरेज। स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाकर वर्कलोड कम करने की जरूरत मानी है। इसके साथ ही बहुत अच्छा काम करने वालों का सम्मान और प्रोत्साहन राशि और कोरोना संक्रमितों के इलाज से संबंधित स्थान पर मनोरंजन के पर्याप्त साधन की मांग रखी।

    पिछले साल सितंबर से दिसंबर तक 111 स्वास्थ्यकर्मियों पर हुआ सर्वे 

    आइजेएमआर में प्रकाशित सर्वे पिछले साल सितंबर महीने से दिसंबर देश के 10 राज्यों में हुआ। इस दौरान 111 स्वास्थ्यकर्मियों के टेलीफोन पर बात कर चुनिंदा सवालों के जरिए उनका इंटरव्यू लेते हुए यह अध्ययन किया गया। इनमें 20-30 आयुवर्ग के 41, 31 से 40 आयुवर्ग में 52, 41 से 50 के 18 स्वास्थ्यकर्मी रहे। इनमें 51 पुरुष स्वास्थ्यकर्मी, 60 महिलाएं थीं।

    सर्वे में 25 डाक्टर और 36 नर्स

    जिन स्वास्थ्यकर्मियों का सर्वे किया गया उनमें 25 डाक्टर थे। वहीं 36 नर्स भी अध्ययन में शामिल रहे। इसके अलावा 14 एंबुलेंस चालक, नौ कम्यूनिटी वर्कर, 10 सिक्योरिटी गार्ड और 17 लैबोरेट्री स्टाफ से डा.बीना ई थामस और उनकी टीम ने फोन पर बात कर स्वास्थ्यकर्मियों पर पड़े मानसिक असर का अध्ययन कर रिपोर्ट तैयार की।