बरेली, जागरण संवाददाता। Bareilly Ramleela News : नाथ नगरी के नाम से पहचान रखने वाली बरेली भगवान शंकर के सात नाथ मंदिरों से ही प्रसिद्ध नहीं, यहां लोगों के दिलों में भगवान श्रीराम भी विराजते हैं। प्रभु श्रीराम की लीलाएं मंच पर खूब लुभाती हैं। हर साल स्थानीय कलाकारों के साथ ही बाहर रंगकर्मी भी रामलीला के मंचन को यहां आते हैं।

वर्षों से मंच पर की जाने वाली रामलीलाएं मर्यादा, कर्तव्यनिष्ठा, संस्कारों के साथ ही सनातन परंपरा को प्रदर्शित कर रही हैं। यह रामलीलाएं अपने आप में इतिहास और सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए हैं। सबरंग के इस अंक में हम शहर में होने वाली इन रामलीलाओं के बारे में बता रहे हैं।

455 वर्ष पुरानी है चौधरी तालाब पर होने वाली रामलीला

रानी महालक्ष्मी बाई रामलीला समिति की ओर से होने वाली रामलीला का इतिहास 455 वर्ष पुराना हो चुका है। तुलसी कृत रामायण ग्रंथ के अनुसार होने वाली पारंपरिक रामलीला के मंचन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। लाइट, साउंड, मंच सज्जा और सुविधा व्यवस्थाओं में समय के अनुसार आधुनिक परिवर्तन जरूर होते हैं।

समिति के अध्यक्ष रामगोपाल मिश्रा बताते हैं कि 455 वर्ष पूर्व यानी संवत् 1624 में लखना स्टेट के राजा बसंत राव त्रिपाठी ने पत्नी की याद में रामलीला की शुरुआत की थी। विशेषता यह है कि प्रदेश में यह एक ही रामलीला है, जिसका मंचन तीन जगहों पर होता है।

चौधरी तालाब से शुरू होने वाली रामलीला का मंचन बड़ा बाग और गुलाब नगर स्थित रानी साहब फाटक पर धूमधाम से किया जाता है। बताया कि प्राचीन समय से चल रही रामलीला में अब तक अयोध्या, लखनऊ, गोरखपुर आदि जिलों से कलाकार अपनी अदाकारी की अनोखी छटा बिखेर चुके हैं। इस बार बिहार के बेगूसराय जिले के 26 कलाकार रामलीला का मनमोहक मंचन कर रहे हैं।

पढ़ाई व नौकरी करने वाले कलाकारों से सजती है रामलीला

सुभाष नगर रामलीला में पेशेवर कलाकार नहीं बल्कि स्थानीय लोग ही रामचरितमानस के पात्रों की भूमिका निभाते हैं। इनमें कोई बैंक, फार्मा, प्रोफेसर समेत कई सरकारी नौकरियों में हैं। यही नहीं विद्यार्थी भी इस रामलीला में मंचन कर दर्शकों के दिल में अपनी अदाकारी से जगह बनाते हैं।

सुभाष नगर में वर्ष 1939 यानी 82 सालों से निरंतर होने वाली रामलीला के कलाकारों ने कोई आधुनिक बदलाव नहीं किया है। रामलीला कमेटी के महामंत्री आलोक तायल ने बताया कि शुरुआती दिनों में बुजुर्गों ने रामलीला की शुरुआत की थी। तब वर्तमान की तरह इतनी आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं।

तब घरों से कई सारे तखत, चादर और रोशनी के लिए लालटेन एकत्र कर मंच तैयार किया जाता था। तब भी श्रवण कुमार के नाटक से ही रामलीला की शुरुआत होती थी। समय के साथ व्यवस्थाओं में तो बदलाव हुए, लेकिन, कलाकारों के संवाद, पटकथा, रूपरेखा और शैली में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया गया है।

उन्होंने बताया कि रामलीला का मंचन कथावाचक राधेश्याम की रामायण के आधार पर होता है। इस रामलीला में अमेरिका निवासी प्रो. पमेला न सिर्फ भूमिका निभाती रही हैं बल्कि कथावाचक राधेश्याम पर शोध भी किया है।

72 साल पहले स्थानीय लोगों ने की थी रामलीला मंचन की शुरुआत

सात नाथ मंदिरों में वनखंडीनाथ मंदिर प्रमुख है। पूर्व में यहां बड़े स्तर पर किसी तरह का आयोजन नहीं होता था। अन्य जगहों पर रामलीला देख लोगों के मन में विचार आया कि यहां प्राचीन मंदिर होने की वजह से यहां भी रामलीला का मंचन होना चाहिए।

ऐसे में आसपास के लोगों ने एक राय होकर वर्ष 1952 से वनखंडीनाथ मंदिर के प्रांगण में रामलीला खेलने की शुरुआत की। रामलीला मंचन की तैयारियां रामभक्त एक-दूजे के सहयोग से करते थे। इसके बाद वर्ष 1972 में छदम्मी प्रधान और लालसा प्रसाद राठौर ने रामलीला कमेटी का पंजीकरण कराया।

ताकि भविष्य में पंजीकरण न होने की वजह से कोई दिक्कत न आए। कमेटी संरक्षक हरिओम राठौर ने बताया कि मंडल में यह पहली ऐसी रामलीला है जिसके साथ-साथ श्रीकृष्णलीला का भी मंचन होता रहा है। दर्शकों की इच्छा के अनुरुप वर्ष 1785 यानी 42 साल पहले यहां दंगल की शुरुआत हुई।

वर्तमान में भी जिसकी प्रतिक्रिया पहले की तरह है। वर्ष 1990 में सेठ गिरधारी लाल साहू को रामलीला कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। गिरधारी लाला साहू और उत्तराखंड सरकार में केंद्रीय मंत्री रेखा आर्य के सहयोग के बाद से रामलीला को भव्य रूप दिया जा रहा है।

होली वाली रामलीला की अपनी अलग पहचान

श्री रामलीला सभा के तत्वावधान में छोटी बमनपुरी मेंं होने वाली रामलीला की अपनी अलग पहचान है। यहां वर्ष 1861 से निरंतर श्री रामलीला का मंचन हो रहा है। इस रामलीला कमेटी को प्रदेश सरकार भी एक लाख रुपये की आर्थिक सहायता देती रही है, जिस धनराशि को बढ़ाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ से फिर आग्रह किया जा रहा है।

कमेटी के पदाधिकारी विशाल मेहरोत्रा ने बताया कि इससे पहले यहां बच्चे टीन गत्ते आदि के मुकुट और बालों की दाढ़ी-मूछ बनाकर रामलीला का मंचन करते थे। फाल्गुन माह के शुरू होते ही शहर के बच्चे रामलीला मंचन की तैयारी शुरू कर देते थे।

सन् 1888–1989 में रामलीला सभा में हकीम कन्हैयालाल, गोपेश्वर बाबू, जगन रस्तोगी, पं. जंगबहादुर, बेनी माधव बिहारी लाल पं. राधेश्याम कथावाचक एवं मिर्जा आदि गणमान्य लोगों ने इस रामलीला को नई दिशा दी। यह लोग रामलीला में विभिन्न पात्रों का रूप रखकर रामलीला का मंचन करते थे।

उस समय रामलीला का मंचन पेटकी रोशनी में रामचरित मानस की चोपाईयों के माध्यम से मंचित किया जाता था। दुल्हड़ी के दिन भगवान श्री नृसिंह भगवान की शोभायात्रा निकाली जाती थी। बताते है कि एक बार रामलीला बंद होने की स्थिति में आ गयी थी।

तब बरेली के धर्म गुरू आला हजरत मुफ्ती-ए-आजम हिन्द ने रामलीला को शुरू कराने की अदालत से स्वीकृति दिलायी थी। होली पर रामलीला की परंपरा को बनाए रखने में क्षेत्र के मुस्लिमों द्वारा पूर्ण सहयोग रहता है। यहां तक कि ख्वाजा कुतुब गद्दी के धर्मगुरू बांके मियां व अजीज मियां जैसे लोगों ने इस रामलीला में सहयोग किया था।

वर्ष 1949 में साहूकारा के स्वर्गीय शिवचरन लाल ने भगवान राम केवट संवाद को मूल रूप देने के लिए लकड़ी की नाव बनवाकर रामलीला सभा को भेंट की। तब से भगवान राम केवट संवाद साहूकारा स्थित भैरों जी के मंदिर पर मंचित किया जाता है।

रामलीला के पात्र जो अभिनय करते थे वह विद्वानों द्वारा तुलसी रामायण की चैपाई की भावपूर्ण एवं रसमय व्याख्या पं. राधेश्याम कथावाचक किया करते थे। उसके उपरांत अपनी वाणी से पं. रघुवर दयाल, पंडित रज्जन गुरू करते थे।

Edited By: Ravi Mishra

जागरण फॉलो करें और रहे हर खबर से अपडेट