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    पैदाइशी वली थे हजरत हाजी वारिस अली शाह

    By JagranEdited By:
    Updated: Tue, 03 Nov 2020 12:06 AM (IST)

    उन्नीसवीं सदी के आरंभ में जन्में हाजी वारिस अली शाह पैदाइशी वली (ऋषि) थे। उनका जीवन अनेक करामातों से भरा पड़ा है।

    पैदाइशी वली थे हजरत हाजी वारिस अली शाह

    प्रताप जायसवाल, देवा (बाराबंकी)

    उन्नीसवीं सदी के आरंभ में जन्में हाजी वारिस अली शाह पैदाइशी वली (ऋषि) थे। उनका जीवन अनेक करामातों से भरा पड़ा है। उनके प्रेम, सौहार्द और एकेश्वरवाद के संदेश आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। उनके आस्ताने पर आने वालों में सभी पंथों से जुड़े लोग शामिल हैं।

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    हाजी वारिस अली शाह का जन्म हजरत इमाम हुसैन की 26वीं पीढ़ी में हुआ था। उनके पूर्वजों का ताल्लुक ईरान के निशापूर के सैय्यद वंश से था। सूफी संत के एक पूर्वज ने बाराबंकी के रसूलपुर कितूर में निवास किया। यहीं से एक बुजुर्ग अब्दुल अहद साहब देवा चले आए। यहां उनकी पांच पीढि़यां बीतीं और हजरत सैयद कुर्बान अली शाह के पुत्र के रूप में वारिस अली शाह ने जन्म लिया। उनका जन्म रमजान माह की पहली तारीख को हुआ था। बताते हैं कि उनमें बचपन से ही ईश्वरीय गुणों के दीदार होने लगे थे। बचपन में मिट्ठन मियां के नाम से जाने जाने वाले हाजी वारिस अली शाह जब तीन वर्ष के थे तो उनके वालिद सैय्यद कुर्बान अली शाह का स्वर्गवास हो गया। कुछ दिन बाद उनकी वालिदा का भी देहावसान हो गया। इसके बाद उनकी दादी साहिबा ने उनकी देखभाल की। उनके चचा सैयद मुकर्रम अली उनकी औलाद की तरह देखभाल करते थे। पांच वर्ष की आयु में सूफी संत जब मकतब (पाठशाला) पहुंचे तो उनकी विलक्षण बुद्धि और प्रतिभा को देखकर उनके गुरु अचंभित थे। उन्होंने दो साल में ही कुरआन कंठस्थ कर ली। सात वर्ष की आयु में सूफी संत के सिर से दादी साहिबा का भी साया उठ गया। इसके बाद उनके बहनोई हजरत हाजी खादिम अली शाह उन्हें अपने साथ लखनऊ ले गए और आगे की पढ़ाई उन्होंने वहीं की। कुछ समय के बाद हजरत खादिम अली शाह ने भी नश्वर शरीर को त्याग दिया।

    17 बार किया हज पंद्रह वर्ष की उम्र में वारिस पाक ने हज का इरादा किया। लोगों ने उन्हें अल्पायु और सफर की कठिनाइयों का स्मरण कराया, कितु उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके बाद उन्होंने अजमेर शरीफ उर्स में शिरकत करते हुए अपनी यात्रा शुरू कर दी। उन्होंने 17 बार हज किया। 12 वर्ष की यात्रा में उन्होंने अरब, ईरान, ईराक, मिस्त्र, तुर्की सहित कई यूरोपीय देशों की यात्रा की। एक सफर 1323 हिजरी तदनुसार छह अप्रैल 1905 को सुबह 4 बजकर 13 मिनट पर सूफी संत हाजी वारिस अली शाह ने दुनिया से पर्दा कर लिया। उन्हें कस्बे में ही समाधि दी गई।