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    Deva Mela 2022: प्रेम का प्रतीक है हाजी वारिस अली शाह का जीवन, बचपन से ही थी विलक्षण प्रतिभा

    By Deepak MishraEdited By: Anurag Gupta
    Updated: Thu, 13 Oct 2022 06:55 AM (IST)

    Deva Mela 2022 सूफी संत हजरत सैय्यद हाजी वारिस अली शाह में बचपन से ही ईश्वरीय गुणों के दीदार होने लगे थे। उन्‍होंने ‘जो रब है वही राम है’ के माध्यम से समाज को ईश्वर के एक होने का संदेश दिया।

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    Deva Mela 2022: ईश्वरीय गुणों से भरपूर थे हाजी वारिस अली शाह।

    बाराबंकी, [प्रताप जायसवाल]। Deva Mela 2022 19वीं सदी के आरंभ में देवा की पावन भूमि पर वारिस रूपी महान सूफी संत का अवतरण हुआ। सूफी संत हजरत सैय्यद हाजी वारिस अली शाह बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उन्हें पैदाइशी वली (ऋषि) भी कहा जाता था। उनका जीवन त्याग, समर्पण और निश्छल प्रेम का प्रतीक था। ‘जो रब है वही राम है’ के माध्यम से उन्होंने समाज को ईश्वर के एक होने का संदेश दिया।

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    उनका प्रेम, सौहार्द और भाईचारे का संदेश आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। आज भी उनके आस्ताने पर आने वाले लाखों दीन-दुखी उनके करम से अपनी हर मुरादें पाते हैं। महान सूफी संत हाजी वारिस अली शाह का जन्म हजरत इमाम हुसैन की 26वीं पीढ़ी में हुआ था। आपके पूर्वजों का ताल्लुक ईरान के निशापूर के सैय्यद वंश से था।

    पहली रमजान को हुई थी पैदाइश 

    सूफी संत के एक पूर्वज ने बाराबंकी के रसूलपुर किंतूर में निवास किया। यहीं से एक बुजुर्ग अब्दुल अहद साहब देवा चले आए। यहां उनकी पांच पीढियां बीतीं और हजरत सैय्यद कुर्बान अली शाह के पुत्र के रूप में सरकार वारिस पाक ने जन्म लेकर देवा की सरजमीं को पवित्र किया। सूफी संत की पैदाइश पहली रमजान को हुई थी।

    बचपन से ही थे ईश्‍वरीय गुण 

    बताते हैं कि आपने पैदाइश के दिनों में भी रोजा रखा था। उनमें बचपन से ही ईश्वरीय गुणों के दीदार होने लगे थे। बचपन में मिट्ठन मियां के नाम से जाने-जाने वाले हाजी वारिस अली शाह जब तीन वर्ष के थे तो उनके वालिद सैय्यद कुर्बान अली शाह का स्वर्गवास हो गया। कुछ दिन बाद उनकी वालिदा का भी देहावसान हो गया। इसके बाद उनकी दादी साहिबा ने उनकी देखभाल की। उनके चचा सैय्यद मुकर्रम अली उनकी औलाद की तरह देखभाल करते थे।

    प्रतिभा को देखकर गुरु भी थे अचंभित

    पांच वर्ष की आयु में सूफी संत जब मकतब (पाठशाला) पहुंचे तो उनकी विलक्षण बुद्धि और प्रतिभा को देखकर उनके गुरु अचंभित थे। उन्होंने दो साल में ही कुरआन कंठस्थ कर ली। सात वर्ष की आयु में सूफी संत के सिर से दादी साहिबा का भी साया उठ गया। इसके बाद उनके बहनोई हजरत हाजी खादिम अली शाह उन्हें अपने साथ लखनऊ ले गए और आगे की पढ़ाई उन्होंने वहीं की। सूफी संत का ज्ञान ईश्वरीय देन था, जिसकी बदौलत अल्पकाल में ही वह अनेक पुस्तकों के ज्ञाता हो गए। बचपन से ही वह अन्य बालकों से जुदा और निस्वार्थ दया और सहानुभूति की अद्वितीय मिसाल थे। वारिस पाक अक्सर जंगल मैदान में जाकर ईश्वर के प्रेम में लीन रहते थे।

    17 बार क‍िया हज

    हजरत खादिम अली शाह की शिक्षा दीक्षा में वारिस पाक का कुछ ही समय व्यतीत हुआ था कि हजरत खादिम अली शाह ने नश्वर शरीर को त्याग दिया। 15 वर्ष की उम्र में वारिस पाक ने हज का इरादा किया। लोगों ने उन्हें अल्पायु और सफर की कठिनाइयों का स्मरण कराया, किंतु उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके बाद उन्होंने अजमेर शरीफ उर्स में शिरकत करते हुए अपनी यात्रा शुरू कर दी। इस दौरान सरकार वारिस पाक ने 17 बार हज किया।

    कई देशों की यात्रा की 

    12 वर्ष की यात्रा में उन्होंने अरब, मिस्र, तुर्की सहित कई यूरोपीय देशों की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने लोगों को भाइचारे और सौहार्द का संदेश दिया। उनके सूफी दर्शन के संदेश आज भी लोगों को सौहार्द और मोहब्बत का संदेश दे रहे हैं। एक सफर 1323 हिजरी तदनुसार छह अप्रैल 1905 को सुबह चार बजकर 13 मिनट पर सूफी संत हाजी वारिस अली शाह ने दुनिया से पर्दा कर लिया। उन्हें कस्बे में ही समाधि दी गई। उनके आस्ताना शरीफ पर आज भी देश-विदेश के लाखों जायरीन अपनी खिराजे अकीदत पेश करने आते हैं।