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    अंधेरी जिदगी की रोशनी बनकर उभरे श्याम

    By JagranEdited By:
    Updated: Mon, 04 Jan 2021 10:29 PM (IST)

    छह साल में दो हजार से अधिक लोगों की आंख का करवा चुके हैं ऑपरेशन खुद की मुफलिसी व दिव्यांगता ने दी प्रेरणा

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    अंधेरी जिदगी की रोशनी बनकर उभरे श्याम

    बलरामपुर : जिले के पिछड़े तराई इलाके में रहने वाले श्याम मनोहर तिवारी बुजुर्गो के लिए रहनुमा बन गए हैं। परसा करमैती गांव निवासी श्याम ने एक हादसे में अपना एक हाथ गवां दिया। दिव्यांगता की पीड़ा से सबक लेकर आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गो की जिदगी का अंधेरा दूर करने को ठानी।

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    इसके लिए स्वास्थ्य विभाग व निजी अस्पतालों से संपर्क साधकर मोतियाबिद के मरीज चिन्हित करने शुरू किए। निजी खर्च पर उन्हें निश्शुल्क ऑपरेशन शिविर तक पहुंचाने व वापस लाने का बीड़ा उठा लिया। करीब छह साल में 2000 से अधिक लोगों का मुफ्त ऑपरेशन करा चुके हैं। खुद की जिदगी से लिया सबक, शुरू की गरीबों की मदद :

    - पेशे से किसान श्याम मनोहर का जीवन बचपन से ही संघर्षपूर्ण रहा। छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया सिर से उठ गया था। आठवीं पास करने के बाद आर्थिक तंगी के कारण आगे की पढ़ाई बाधित हो रही थी। इस पर श्याम मनोहर ने गांव के ही एक व्यक्ति के यहां खाना बनाने का काम शुरू किया। बदले में जो पैसे मिलते, उससे पढ़ाई जारी रखी। एक बार खाना बनाते समय खौलते तेल में दाहिना हाथ चला गया जिससे उनका हाथ बुरी तरह जल गया। पैसे के अभाव में समुचित इलाज न हो सका। जख्म इतना ज्यादा था कि हाथ काटना पड़ा।

    करीब 15 किलोमीटर दूर मथुरा स्थित स्कूल जाना भी मुश्किल हो गया। पढ़ने की जिद थी, इसलिए पैदल ही स्कूल जाने लगे। कदम-कदम पर चुनौतियों को मात देते हुए पढ़ाई पूरी की। अपनी मुफलिसी व दिव्यांगता से सबक लेकर उन्होंने ठान लिया कि किसी गरीब की शिक्षा व इलाज पैसे के अभाव में नहीं रुकने देंगे। बस यहीं से गरीबों की मदद का सिलसिला शुरू हो गया। दो हजार लोगों के आंखों की बचाई रोशनी :

    - तराई इलाके की अधिकांश आबादी गरीबी व पिछड़ेपन का शिकार है। ऐसे में लोगों को योजनाओं की जानकारी भी नहीं हो पाती है। श्याम मनोहर ने पैसे के अभाव में आंख की रोशनी खो रहे लोगों को चिन्हित करना शुरू किया।

    वर्ष 2014 में उन्होंने लायंस आइ हॉस्पिटल के निश्शुल्क शिविर के बारे में सुना। अस्पताल प्रशासन से संपर्क कर क्षेत्र में शिविर लगवाया। यहां आसपास के मोतियाबिद के मरीजों को अपने साधन से शिविर तक पहुंचाया। ऑपरेशन के बाद उनकी निगरानी भी करते रहे।

    इसके बाद वह गांव-गांव शिविर लगवाकर लोगों की आंखों का ऑपरेशन करवाने लगे। छह साल में करीब दो हजार लोगों की आंख का ऑपरेशन करवा चुके हैं। यही नहीं, शिक्षा से वंचित बच्चों का दाखिला भी गांव के परिषदीय स्कूलों में करवाया।