Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    कृषि भूमि के लिए जरूरी हैं पोषक तत्व

    By Edited By:
    Updated: Tue, 14 May 2013 06:19 PM (IST)

    आजमगढ़: रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग एवं जीवांश खादों के नगण्य प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ा है। इसका परिणाम है कि प्रदेश के अधिकांश जनपदों में भूमि में मुख्य पोषक तत्वों के साथ-साथ द्वितीयक तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी कमी हो गई है। कृषि विज्ञान केंद्र के सस्य वैज्ञानिक डॉ. आरके सिंह के मुताबिक स्वस्थ भूमि में जीवांश कार्बन की मात्रा 0.80 प्रतिशत होनी चाहिए लेकिन अधिकांश कृषकों द्वारा धान-गेहूं का लगातार फसल चक्र अपनाने से यह घटकर 0.2 प्रतिशत से कम रह गई है। वर्तमान में मृदा परीक्षण से प्राप्त परिणामों के आधार पर प्रदेश के सभी जनपदों में नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक, लोहा, तांबा, मैंगनीज आदि महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की भूमि में कमी पाई जाने लगी है। ऐसे में मिट्टी की जांच और निर्धारित मात्रा में पोषक तत्वों का उपयोग जरूरी है। किसान फसलों में पोषक तत्वों की कमी के कारण दिखाई देने वाले लक्षण से भी इसका अंदाजा लगा सकते हैं।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    नत्रजन:

    नत्रजन की कमी के कारण पौधों की वृद्धि रुक जाती है। पुरानी पत्तियां हल्के हरे या पीले रंग की हो जाती हैं। यह पीलापन पत्तियों के अग्र भाग से प्रारंभ होकर पूरी पत्ती पर समान रूप से फैल जाता है। जो बाद में सूखकर गिर जाती है।

    फास्फोरस :

    पौधों में जड़ों का विकास रुक जाता है। कल्लों की संख्या में कमी, फसल का देर से पकना, पुरानी एवं नई पत्तियां कत्थई रंग की हो जाती है। नई पत्तियों के किनारे कट-फट से जाते हैं और बाद में भूरा रंग किनारों से बीच की तरफ बढ़ने लगता है।

    पोटाश :

    पौधों का तना पतला और आकार में छोटा हो जाता है। शर्करा वाली फसलों में उपज की भरी कमी हो जाती है। नई पत्तियां मुड सी जाती है।

    सल्फर :

    नई पत्तियां पीले रंग की निकलती है। अधिक कमी होने पर पूरा पौधा पीला पड़ने लगता है।

    कैल्शियम :

    यह पौधों में बफर क्षमता को विकसित करता है। विषाक्ता को कम कर देता है। इसकी कमी से मूंगफली में पेग (गाइनोफोर) व फलियां कम बनती हैं, टमाटर की पत्तियां ऐंठनदार व पीली होकर सूखने लगती है तथा फल का निचला हिस्सा सड़ने लगता है।

    आयरन:

    पौधों में लोहे की कमी को सफेदा रोग के नाम से भी जाना जाता है। नई पत्तियों की नसों के मध्य का भाग पीला पड़ते हुए बाद में सफेद हो जाता है।

    मैगनीज -

    बलुई, क्षारीय, चूनी मिट्टी में मैंगनीज की कमी पाई जाती है। पत्तियां शिराओं के पास पीले भूरे रंग के घने धब्बे बनने लगते हैं। जो बाद में बढ़कर संपूर्ण पत्ती पर फैल जाता है।

    जिंक :

    धान-गेहूं फसल प्रणाली, उसरीली, हल्की भूमियां तथा फास्फोरस का अधिक प्रयोग आदि क्षेत्रों में जिंक की कमी होती है। पौधों की वृद्धि रुक जाना, मक्का में नई पत्तियां का सफेद होना, धान में पत्तियों पर कत्थई रंग के गोलनुमा धब्बे पड़ना, गेहूं में नई पत्तियां छोटी हो जाती हैं।

    बोरान :

    इसकी कमी से पौधों के शीर्ष भाग का विकास नहीं हो पाता है। लंबाई में शिरों के कलियों का गिरना शुरू हो जाता है। बोरान की कमी से फूल-गोभी के फूल का रंग भूरा, तने का खोखला होना, मक्का में असमान व कम दाना का लगना तथा फलदार पौधों के फूलों का गिरना आदि इसका प्रमुख लक्षण है।

    मालिब्डेनम :

    मालिब्डेनम व नत्रजन की कमी के लक्षण आपस में काफी मिलते-जुलते हैं। फूलगोभी में बीच की पत्तियां में हरेपन की कमी, मुड़कर सूखने के साथ गिर जाती है। अंत में डंठल ही बचता है। जिसे व्हीपटेल के नाम से जाना जाता है।

    कापर :

    अत्यधिक चूना, नत्रजन व फास्फोरस प्रयोग से इस तत्व की उपलब्धता काफी घट जाती है। अनाज के दानों में सिकुड़ापन आ जाता है। मक्का में नई पत्तियां पीली होने के साथ अग्रभाग सूखकर ऐंठ जाता है।

    मोबाइल पर ताजा खबरें, फोटो, वीडियो व लाइव स्कोर देखने के लिए जाएं m.jagran.com पर