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    अपनी माटी से हमेशा जुड़े रहे पीयूष

    By JagranEdited By:
    Updated: Sun, 07 Feb 2021 11:15 PM (IST)

    साहित्यकार जगदीश पीयूष तीन भाई थे। तीन भाइयों के

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    अपनी माटी से हमेशा जुड़े रहे पीयूष

    अमेठी : साहित्यकार जगदीश पीयूष तीन भाई थे। तीन भाइयों के परिवार में तीन पुत्र भी है। पीयूष के बड़े पुत्र दिल्ली में रहते हैं तो दो पुत्र अमेठी में रहकर अपना कारोबार करते हैं। बडे पुत्र राकेश पांडेय साहित्य जगत से जुड़े हैं। वह प्रवासी संसार नामक पत्रिका भी निकालते हैं। वह कहते हैं कि

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    बाबूजी बहुमुखी व्यक्तित्व के स्वामी थे। वह साहित्यकार थे, राजनीतिज्ञ थे, शिक्षक थे, समाजसेवी थे, लोकविद थे, और बहुत कुछ। वह अपनी माटी से जीवन पर्यंत जुड़े रहे। वह अपनी लेखनी के माध्यम से गांव से ग्लोबल हुए। विश्व हिदी सम्मेलन, अमेरिका में हिदी सेवा के लिए इसीलिए पुरस्कृत भी किया गया। अवधी उनके रक्त की भाषा थी, अवधी में ही सोचते थे और अवधी ही जीते थे। उनकी सादगी हमारे और समाज के लिए प्रेरणा है। वह रामायण में वर्णित राम स्वभाव से प्रेरित रहे, अपना स्नेह परिवार व बच्चों के सामने सार्वजनिक प्रकट नहीं करते थे, किन्तु सभी पर दूर से नजर रखते थे। बोलने में स्पष्टवादिता का कोई जवाब नहीं था। साहित्य के क्षेत्र में मेरी सक्रियता का श्रेय उन्हें ही जाता है, क्योंकि उन्हें देख कर प्रेरणा मिलती थी। आज वे नहीं है। लेकिन, उनकी आभा सदा ऊर्जावान बनाए रखेगी। कारोबार के साथ समाज सेवा से जुड़े अनुपम पांडेय अपूर्व ने पिता के बीमार होने के दिनों में उनकी खूब सेवा की। छोटे थे तो पिता से लगाव भी अधिक था। वह कहते हैं कि बाबू जी अवसान वह क्षति है। जिसकी इस जन्म में कोई पूर्ति नहीं संभव। उत्कर्ष के बाद भी सरलता, वैभव के बाद भी सादगी, बुलंदी के बाद भी जमीन से जुड़ा कैसे रहा जाता है। यह सब उन्होंने सिखाया। सिखाया ही नहीं बल्कि जीकर दिखाया। अब बस इतनी कामना है कि उनके आदशरें पर चल सकूं। उनके बनाए आदर्शों को कायम रख सकूं। यह प्रेरणा और शक्ति भी वे ही प्रदान करेंगे। अनूप पांडेय ने कहाकि बाबू जी ने साहित्य व शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा काम किया है। उनकी सोच व कार्यों को निरंतर आगे बढ़ाने का प्रयास करना है।

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    -पीयूष जी ने सिखाया था बहुत कुछ

    कांग्रेस एमएलसी दीपक सिंह कहते हैं कि जगदीश पीयूष हमारे गुरू थे। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन के साथ राजनीति में भी हमें आगे बढ़ाने का काम किया। इस जीवन में उन्होंने हमें बहुत कुछ सिखाया है। किताबों को पढ़ने व समझने की आदत भी उन्होंने ही डाली। जिसका आज सदन व बाहर भी बहुत लाभ मिलता है। उनका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है।