अवध, अवधी और 'अमेठी के पीयूष'
अवध अवधी और अमेठी के जगदीश पीयूष। यह शब्द नहीं।

अमेठी : अवध, अवधी और अमेठी के जगदीश पीयूष। यह शब्द नहीं। वह मजबूत आधार है। जिसके बिना अमेठी का ताना-बाना अधूरा है। पीयूष के निधन पर साहित्य उदास है तो राजनीति भी दुखी। शहर में छोटी-मोटी चाय की दुकान कर जीवन यापन करने वाले भी शोक में हैं। हो भी क्यों ना, यही सड़क किनारे की दुकानें पीयूष की सादगी की गवाह हैं। उनका सबसे अधिक समय यहीं बीतता था। पिछले पांच दशक से साहित्य, समाज और सियासत को एक साथ लेकर चलने की पीयूष की कला के सब मुरीद है।
छह अगस्त 1950 का अमेठी के कसारा गांव में जन्मे जगदीश प्रसाद पांडेय 'पीयूष' अपने जीवन में अजातशत्रु रहें। जिला मुख्यालय गौरीगंज सत्तर की दशक में पीयूष की कर्मभूमि बना, उन्होंने यहां रणंजय इंटर कालेज में नौकरी के साथ लेखन की शुरूआत की। संजय गांधी अमेठी आएं तो पीयूष उनके खास लोगों में रहें। राजीव गांधी के साथ ही सोनिया, राहुल व प्रियंका तक से पीयूष के बहुत मधुर रिश्ते रहे। सियासत में ऊंची पहुंच होने के बाद भी वह अवधी साहित्य की साधना में लगे रहे। दस खंडों में लोक साहित्य की पहली अवधी ग्रन्थावली प्रकाशित करके अवधी साहित्य का पूरा पिटारा एक स्थान पर रखा दिया है। जो आने वाले समय में हर किसी के लिए उपयोगी होगा। पीयूष ने अवधी में चार खंड काव्य और हिन्दी में तमाम विचार ग्रन्थ लिखें है। 1989 में गौरीगंज के मिश्रौली गांव में विज्ञान गांव की ओर प्रदर्शनी लगवाई। इस प्रदर्शनी में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी आए थे। उसी स्थान पर बाद में जगदीश पीयूष ने बाद में राजीव गांधी साइंस कॉलेज, राजीव गांधी विद्या भवन और पीयूष प्रशिक्षण महाविद्यालय की स्थापना की। - पीयूष ने लिखा था नारा, अमेठी की डंका, बिटिया प्रियंका
संजय गांधी व राजीव गांधी के करीबी रहे जगदीश पीयूष ने 1984 में नारा लिखा था। अमेठी का डंका, बिटिया प्रियंका। राजीव के आगमन पर नारा रहा भैया का भौजाई का, वोट कांग्रेस आई का। राजीव की हत्या के के बाद पीयूष ने नारा लिखा था कि लेबै बदला देबै खून, भैया बिना अमेठी सून। राहुल के लिए भी नारा लिखें, राहुल एक मशाल है, नया जवाहर लाल है। - मिश्रौली गांव में विज्ञान गांव की ओर लगवाई थी प्रदर्शनी
1989 में गौरीगंज के मिश्रौली गांव में विज्ञान गांव की ओर प्रदर्शनी लगवाएं। प्रदर्शनी में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी तक आए थे। प्रदर्शनी वाले स्थल पर बाद में उन्होंने राजीव गांधी साइंस कॉलेज, राजीव गांधी विद्या भवन और पीयूष प्रशिक्षण महाविद्यालय की स्थापना की। - सादगी रही मिसाल
पीयूष के पहचान उनके सादगी से रही। खादी के कुर्ता मा बिक्की पै चलें। जहां मन करा बैठे, जहां मन करा खाएं। सबसे मिले। सृजन पीठ पै लोगन के बीच चाय औे देशी व्यंजनन पै चर्चा करें। पूरे जीवन गांधीवादी रहें। - अटल तक से पहचान
पीयूष देखने में बहुत सरल थे। लेकिन, साहित्य व सियासत के हर इंसान से उनकी पहचान रही। अटल जी, बाल ठाकरे तक अपने भाषण में उनका नाम लेते थे। ऐसा लोग बताते हैं। राजीव गांधी की हत्या के बाद पीयूष ने अमेठी से पेरम्बदूर तक पद यात्रा निकाली थी। इस शांति यात्रा के स्वागत तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने खुद पेरम्बदूर में पहुंच कर किया था।
- पीयूष का साहित्य सृजन
अपने जीवनकाल में पीयूष ने साहित्य के सभी क्षेत्र में प्रतिभा का लोहा मनवाया। पीयूष ने सुयोधन व तथागत (खंडकाव्य), गांधी और दलित नवजागरण, मेरा भारत महान, गांधी गांधी गांधी तथा पानी पर हिमालय व अंधरे के हांथ बटेर की रचना की। साथ ही उन्होंने 10 खंड में अवधी ग्रंथावली के अलावा किस्से अवध के, अवधी साहित्य सर्वेक्षण और समीक्षा, अवधी साहित्य के सरोकार, लोक साहित्य के पितामह, बोली बानी (14 अंक अनियतकालीन
पत्रिका), लोकायतन का संपादन भी किया। -विदेशों में भी पीयूष को मिला सम्मान पीयूष को सातवें विश्व हिदी सम्मेलन के मौके पर अमेरिका के न्यूयार्क में विश्व हिदी सम्मान, नागरी प्रचारिणी सभा मॉरीशस द्वारा मॉरीशस में अंतरराष्ट्रीय हिदी उत्सव सम्मान, उत्तर प्रदेश हिदी संस्थान द्वारा लोक भूषण व जायसी सम्मान से भी नवाजा गया। इसके अलावा 1993 में सोवियत रूस में आयोजित विश्व युवा महोत्सव में सहभागिता करने के अलावा उन्होंने हिदी व अवधी के प्रचार प्रसार के लिए कई देशों की यात्रा भी की।
- राष्ट्रीय एकता व खुशहाली के पक्षधर थे पीयूष प्रख्यात साहित्यकार रवींद्र कालिया ने जगदीश पीयूष पर एक ग्रंथ जगदीश पीयूष कलम का सफर लिखा है। वहीं कालिया ने एक अगस्त 1991 को पीयूष की पुस्तक गांधी-गांधी -गांधी में अपना संदेश कुछ यू लिखा है जिस प्रकार इंदिरा-राजीव -सोनिया का स्पर्श मिलते ही अमेठी की ऊसर बंजर धरती लहलहा उठी, वैसे निम्न मध्यवर्गीय ब्राहम्ण परिवार में पैदा हुए जगदीश पीयूष राजीव-सोनिया के सम्पर्क में आते ही आंचलिक पत्रकारिता से देश भर में विख्यात हो गए। बल्कि यह कहना भी गलत न होगा, अन्तर्राष्ट्रीय मीडिया के लिए भी बिना उनके सहयोग के बिना अमेठी के विकास की कहानी कहना मुश्किल हो गया। पीयूष राष्ट्रीय एकता व खुशहाली के पक्षधर थे। - हर दल में पीयूष का सम्मान
जगदीश पीयूष वैसे तो कांग्रेस से जीवन भर जुड़े रहे पर दूसरे दलों में भी उनका खासा सम्मान था। सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्यों में वह भाजपा व दूसरे दलों के लोगों के साथ भी कंधा से कंधा मिलाकर काम करते दिखते थे। शायद तभी उनकी अंतिम यात्रा में हर कोई पहुंचा था।
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