महर्षि भरद्वाज मंदिर के मुख्य द्वार पर लिख दिया भारद्वाज, इस अशु्द्धि से भाषा विज्ञानी खिन्न
भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पांडेय ने महर्षि भरद्वाज मुनि मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार पर अंकित भारद्वाज आश्रम को अशुद्ध बताया है। उन्होंने कहा कि भरद्वाज आश्रम होना चाहिए था लेकिन संबंधित अधिकारियों व विद्वतजनों ने ध्यान नहीं दिया

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। शहर में आनंद भवन के समीप विश्वगुरु महर्षि भरद्वाज मुनि का आश्रम है। वही भरद्वाज आश्रम जहां त्रेता युग में 10 हजार विद्यार्थी अध्ययन करते थे। प्रभु श्रीराम वनवास जाते और लौटते समय महर्षि भरद्वाज का आशीर्वाद लेने उनके इसी आश्रम आए थे। महर्षि भरद्वाज को विश्व का प्रथम कुलाधिपति और कुलपति कहा गया है। प्रयाग को बसाने का श्रेय भी उन्हीं को है।
भाषाविज्ञानी और समीक्षक आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पांडेय ने महर्षि भरद्वाज मुनि मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार पर अंकित भारद्वाज आश्रम को अशुद्ध बताया है। उन्होंने कहा कि भरद्वाज आश्रम होना चाहिए था
जानिए किसी तरह से की इसकी व्याख्या
भाषा विज्ञानी ने बताया कि नाम सदैव संज्ञा होता है, जबकि भारद्वाज विशेषण- शब्द है, जिसका अर्थ 'भरद्वाज-कुल/गोत्र में उत्पन्न है, जबकि 'भरद्वाज संज्ञा का शब्द है, जिसका अर्थ 'एक गोत्र-प्रवर्तक मंत्रकार ऋषि है। आचार्य पं. पृथ्वीनाथ ने अपने तर्क की पुष्टि के लिए बताया, गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस में लिखा है-
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहिं रामपद अति अनुरागा।।
तुलसी बाबा पुन: कहते हैं, 'भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिवर मनभावन।। इतना ही नहीं, तीर्थराज प्रयाग की सत्ता और महत्ता को ''भरद्वाज मुनि के नाम के साथ इस रूप में रेखांकित किया गया है,
''त्रिवेणी माधवं सोमं, भरद्वाजं च वासुकिम्।
वन्दे अक्षयवटं शेषं, प्रयागं तीर्थनायकम्।। इतना सब पढऩे और घटने के बाद भी यदि प्रयाग का नामकरण करने वाले प्रयाग के प्रथम वासी, प्रथम कुलाधिपति तथा प्रथम विमानविज्ञानी ऋषि भरद्वाज का नाम अशुद्ध (भारद्वाज) लिखा जाये तो ऐसी स्थिति निस्संदेह शोचनीय है।
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।