Sanskarshala: शिक्षिका वंदना सिंह बोलीं- अभिभावक, बुजुर्गों के तकनीक से जुड़ने पर पीढ़ियों के बीच संतुलन बनेगा
शिक्षिका वंदना सिंह ने कहा कि अभिभावकों माता-पिता और बुजुर्गों से ही बच्चों में प्रारंभिक संस्कार विकसित होते हैं। संस्कृति और परंपरा का बीजारोपण उनके माध्यम से होता है। यदि अभिभावकों अथवा घर के बड़े बुजुर्गों को मौजूदा तकनीकी ज्ञान से जोड़ दिया जाए तो जहां उनका उत्साहवर्धन होगा।

प्रयागराज, जागरण संवाददाता। माता-पिता अपने बच्चों के पहले शिक्षक होते हैं। उनका सहयोग बच्चे की पढ़ाई और विकास को प्रेरित करता है। एक सफल शिक्षक के लिए भी बच्चों की प्रगति बहुत मायने रखती है। शिक्षकों को भी अभिभावकों के सहयोग के लिए निरंतर सजग और जागरूक रहना होता है। शिक्षकों को अभिभावकों से निरंतर बातचीत करने की आवश्यकता होती है। यह कहना है प्रयागराज में चंद्रशेखर आजाद इंटर कालेज वंदना सिंह का।
दैनिक जागरण की संस्कारशाला में शिक्षिका के विचार : दैनिक जागरण के संस्कारशाला के तहत शिक्षिका वंदना सिंह ने अपना विचार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि बच्चे की शिक्षा और संपूर्ण विकास महत्वपूर्ण है, ऐसे में एक मजबूत साझेदारी के अलावा कुछ भी मायने नहीं रखता। माता-पिता और शिक्षक दोनों अपने अवरोधों को दूर करते हैं और एक साझा लक्ष्य लेकर काम करने के लिए तैयार रहते हैं। अभिभावक एक नई शिक्षा प्रणाली को अपनाने के साथ-साथ आसानी से शिक्षकों के साथ बातचीत कर सकते हैं। आनलाइन और डिजिटल तकनीक एक मजबूत शिक्षा प्रणाली का मार्ग प्रशस्त करता है। पारंपरिक स्कूली शिक्षा की तरह यहां सभी को अपने बच्चे की प्रगति जानने के लिए अभिभावक-शिक्षक बैठक की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है।
चंद्रशेखर आजाद इंटर कालेज की शिक्षिका वंदना सिंह ने कहा : वंदना सिंह बोलीं कि आनलाइन प्लेटफार्म से शिक्षक मिनटों में माता-पिता को अपडेट दे सकते हैं। अभिभावक अपने बच्चे के परीक्षा में प्रदर्शन, मूल्यांकन और क्रियाकलापों के बारे में अध्यापकों से तुरंत प्रतिक्रिया प्राप्त कर सकते हैं। कोविड संक्रामक काल में जब बच्चों का स्कूल आना बंद था तो कुछ नवीन प्रयोग बेसिक शिक्षा विभाग एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग ने भी किए। इसका बहुत सार्थक परिणाम सामने आया। जिन अभिभावकों के पास स्मार्टफोन था उनसे संपर्क करके शैक्षिक ग्रुप बनाकर अध्ययन सामग्री प्रेषित की गई। अभिभावकों से शिक्षकों ने संपर्क कर उन्हें जागरूक किया और सीमित समय के लिए अपनी निगरानी में बच्चों को पढ़ने के लिए फोन देने का अनुरोध किया। अभिभावकों ने सहयोग भी किया।
अभिभावक रुचिपूर्ण ढंग से विद्यार्थियों को पढ़ाने लगे : उन्होंने कहा कि जिन बच्चों के पास स्मार्टफोन नहीं था उन्हें भी समूह में बैठा कर एक साथ शिक्षण सामग्री साझा की गई। अध्यापकों ने अभिभावकों के मोबाइल में दीक्षा, रीड एलांग एप डाउनलोड करवा कर उनका प्रयोग करना सिखाया, जहां बच्चों की पुस्तकों से लेकर पाठ का भी वीडियो था। इससे अभिभावकों का काम आसान हो गया और वह रुचिपूर्ण ढंग से विद्यार्थियों को पढ़ाने भी लगे। रोचक कहानियां भी उपलब्ध थी जो अभिभावकों और बुजुर्गों को भी पसंद आने लगी। सभी बोर्ड के विद्यार्थियों के लिए स्कूलों ने आनलाइन शिक्षा की व्यवस्था की। अभिभावकों और घर के बुजुर्गों को इसके प्रति जागरूक कर बच्चों को शिक्षा से विमुख नहीं होने दिया। विभिन्न कक्षाओं की शिक्षण सामग्री का प्रसारण दूरदर्शन और रेडियो पर भी किया गया। अभिभावकों तक समय सारणी उपलब्ध कराई गई और उसके माध्यम से बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया गया।
बुजुर्गों को तकनीकी ज्ञान से जोड़ेंगे तो हमारे विकास को निश्चित रूप से गति मिलेगी : उन्होंने कहा कि प्रायः देखा जाता है, घर के बुजुर्ग अभिभावकों को जब तकनीकी जानकारी प्रदान की जाती है तो उन्हें शुरुआत में यह बहुत कठिन कार्य लगता है। कुछ लोग उन्हें इस तरह की तकनीकी जानकारी देने के पक्षधर नहीं होते। उनका मानना होता है कि क्या फायदा, लेकिन समझना होगा कि इसके बहुत से फायदे हैं। मेरा मानना है कि हम बुजुर्गों को तकनीकी ज्ञान से जोड़ेंगे तो हमारे विकास को निश्चित रूप से गति मिलेगी। तमाम बुजुर्ग इस संदर्भ में काफी सजग हो गए हैं। उन्हें जैसे ही थोड़ी जानकारी मिलती है वह दूसरी चीजों को भी सीखने के लिए तत्पर हो जाते हैं। उनकी यह ललक दूसरों के लिए भी प्रेरणास्रोत है। जब वह तकनीकी के सभी पहलुओं से अवगत होंगे तो बच्चों के साथ आसानी से बैठकर उनकी गतिविधियों को देखने के साथ सही गलत का फर्क भी कर पाएंगे। आवश्यकता अनुसार वह बच्चों के मित्र अथवा मार्गदर्शक दोनों बनेंगे। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में संतुलन बनाने में भी सहायक होगा।
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