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    Release of Saraswati magazine : सरस्वती पत्रिका की लेखनी में बनाए रखें गुणवत्ता - विधानसभा अध्‍यक्ष

    By Brijesh SrivastavaEdited By:
    Updated: Sat, 17 Oct 2020 07:55 PM (IST)

    Release of Saraswati magazine इस पत्रिका का उद्देश्य हिंदी की सेवा करना था। आज सरस्वती पुन प्रकट हुई हैैं जिससे साहित्य जगत में लोकमंगल की भावना का अभाव दूर होगा। उन्होंने कहा कि 40 साल बाद शुरू हुई यह पत्रिका फिर उसी रूप में लोगों तक पहुंचेगी।

    हिंदुस्तानी एकेडमी में आयोजित सरस्वती पत्रिका के लोकार्पण समारोह में मौजूद विद्वतजन।

    प्रयागराज,जेएनएन। ऐतिहासिक सरस्वती पत्रिका का शनिवार को वर्चुअल लोकार्पण उत्तर प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष हृदय नारायण दीक्षित ने लखनऊ से किया। कहा कि साहित्य का उद्देश्य लोकमंगल है। वैदिक ऋषियों ने भी सरस्वती के महत्व को बताया और सरस्वती ज्ञान की देवी बनीं। इस पत्रिका का उद्देश्य हिंदी की सेवा करना था। आज सरस्वती पुन: प्रकट हुई हैैं, जिससे साहित्य जगत में लोकमंगल की भावना का अभाव दूर होगा।

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    उन्होंने कहा कि 40 साल बाद शुरू हुई यह पत्रिका फिर उसी रूप में लोगों तक पहुंचेगी। इसकी तुलना किसी और पत्रिका से नहीं की जा सकती।

    साहित्य के माध्यम से ही हम श्रेष्ठ विचारों को एक दूसरे के हृदय तक पहुंचा सकते हैैं : चिंदानंद

    विशेष अतिथि परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश के परमाध्यक्ष चिदानंद सरस्वती ने कहा कि साहित्य के माध्यम से ही हम श्रेष्ठ विचारों को एक दूसरे के हृदय तक पहुंचा सकते हैैं। भारतीय संस्कृति के महत्व को उजागर करते हुए सबका साथ सबका विकास कर सकते हैैं। मुख्य अतिथि शिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष अनिल शर्मा जोशी, विशिष्ट अतिथि डॉ. कमल किशोर गोयनका ने सरस्वती पत्रिका की विशेषताओं पर व्याख्यान दिया। यह सभी यहां हिंदुस्तानी एकेडमी सभागार में आयोजित समारोह में वर्चुअल शामिल हुए। आयोजन हिंदुस्तानी एकेडमी, इंटैक प्रयागराज चैप्टर एवं इंडियन प्रेस प्रयाग के संयुक्त तत्वावधान में हुआ।

    यहां आयोजित समारोह में एकेडमी के रविनंदन ने कहा कि सरस्वती पत्रिका भारतीय नवजागरण का मुखपत्र तथा राष्ट्रीय चेतना की मुखर संवाहिका थी। यह हिंदी साहित्य की पहचान रही है और पुनप्र्रकाशन के बाद भी यह अपने पुराने तेवर के साथ निकलती रहेगी। अध्यक्षता हिंदुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष डॉ. उदय प्रताप सिंह व संचालन एकता शुक्ला ने किया। इंटैक के केएल गुप्ता, पत्रिका के संरक्षक आचार्य महेशचंद्र चट्टोपध्याय, प्रधान संपादक डॉ. देवेंद्र शुक्ल, सह संपादक अनुपम परिहार, कार्यक्रम संयोजक शंभू चोपड़ा, डॉ. पल्लवी चंदेल, निलेश, सुधांशु अग्रवाल, पायल सिंह, वीरेंद्र सिंह, कविता गुप्ता, यश मालवीय, श्लेष गौतम, डॉ. राकेश मिश्र आदि मौजूद रहे।

     

    हिंदी साहित्य की तस्वीर बनी सरस्वती पत्रिका

    ब्रिटिश हुकूमत में इंडियन प्रेस के संस्थापक बाबू चिंतामणि घोष ने सन 1900 में सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कराया था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जनवरी 1903 से दिसंबर 1920 तक इसका संपादन किया। यह पत्रिका का स्वर्णिम काल था। सरस्वती के संपादक रहे पं. देवीदत्त शुक्ल के पौत्र व्रतशील शर्मा बताते हैं कि 'आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने गद्य व पद्य को एक करके उसे खड़ी बोली के रूप में पहचान दिलाई। उसके पहले अधिकतर कविताएं भ्रज भाषा में होती थी, जिन्हें कम लोग समझते थे।

    आचार्य द्विवेदी ने सरस्वती में खड़ी बोली में कविता व कहानियों का प्रकाशन शुरू किया। इससे भाषिक एकता का माहौल बना।' जून 1980 में आर्थिक कारणों से पत्रिका का प्रकाशन बंद हो गया था। इंडियन प्रेस के कर्ताधर्ता एसपी घोष, सुप्रतीक घोष व अरिंदम घोष कहते हैं कि सरस्वती को मौजूदा परिवेश के अनुरूप प्रकाशित किया जाएगा। पत्रिका के संरक्षक प्रो. महेशचंद्र चट्टोपाध्याय, प्रधान संपादक प्रो. देवेंद्र शुक्ल सह संपादक डॉ. अनुपम परिहार बताते हैं कि सरस्वती पहले मासिक छपती थी। लेकिन, अब उसे त्रैमासिक छापा जाएगा। नवीन अंक तीन खंडों में प्रकाशित है। प्रथम खंड में संपादकीय, धरोहर के तहत लेख पुराने छपे हैं। जबकि द्वितीय खंड आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को समर्पित है। तृतीय खंड में समकालीन लेख, कविताएं व नवगीत हैं।

    सरस्वती पर किसने क्या कहा

    प्रख्यात कथाकार मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनाओं को शुद्ध करके सरस्वती में पवित्रता के साथ प्रकाशित करते हैं। इससे शीर्षक की सार्थकता समझ में आती है। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' कहते थे कि सरस्वती वास्तव में ज्ञान का सागर है। जो रचनाकारों को शुद्ध हिंदी लिखना सिखाती है। महादेवी वर्मा ने सरस्वती पत्रिका को हिंदी साहित्य का आधार बताया था। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा था कि सरस्वती पत्रिका के जरिए मुझे हिंदी की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ। मैं अगले जन्म में भी इसी रूप में हिंदी की सेवा करना चाहता हूं।

    सरस्वती में यह है खास

    सरस्वती पत्रिका में साहित्य के साथ कला को भी स्थान दिया गया है। प्रख्यात कथक नर्तक बिरजू महाराज का साक्षात्कार प्रकाशित है। वहीं, रंगमंच, फिल्म व कला पर लेख प्रकाशित है। वहीं, संस्मरण कॉलम स्वर्गवासी रचनाकारों को समर्पित है। कथाकार स्व. दूधनाथ सिंह, स्व. डॉ. नामवर सिंह व स्व. नीलाभ 'अश्कÓ को समर्पित लेख हैं।

    पाकिस्तानी व्यंग्यकार शामिल

    'विदेशी कलम' शीर्षक में पाकिस्तानी व्यंग्यकार मुश्ताक अहमद यूसुफी की रचना शामिल की है। प्रवासी लेख में मॉरीशस से वीरसेन जागा सिंह का आलेख, अमेरिका से कविता वाचक्नवी व अनिल प्रभा ठाकुर की कविताएं प्रकाशित हैं। 

     

    26 साल तक संपादक रहे देवीदत्त

    जनवरी 1900 में सरस्वती पत्रिका के संपादक मंडल में श्याम सुंदर दास, किशोरीलाल गोस्वामी, बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री, जगन्नाथदास रत्नाकर, बाबू राधाकृष्ण दास थे। 1901 में श्यामसुंदर दास को संपादन मिला। फिर आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने जनवरी 1903 से दिसंबर 1920 तक संपादन किया। जनवरी 1921 में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी व उनके नीचे पं. देवीदत्त शुक्ल का नाम संपादक के रूप में छपता था। आंख में दिक्कत होने पर पं. देवीदत्त ने दिसंबर 1946 में स्वत: संपादन छोड़ दिया।  जबकि पदुमलाल 1921 से 1928 कई बार आते-जाते रहे। जनवरी 1947 में उमेशचंद्र मिश्र व देवीदयाल चतुर्वेदी 'मस्तÓ संपादक बने। उमेशचंद्र बाद में हट गए और 'मस्तÓ 1955 तक संपादक रहे। 1956 से 1976 तक श्रीनारायण चतुर्वेदी 'भइया साहबÓ संपादक रहे। निशीथ राय 1977 में संपादक बने। इंडियन प्रेस ने आचार्य महावीर व पं. देवीदत्त को आजीवन पेंशन भी दिया था।