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    Prayagraj: पोक्सो व एससी-एसटी एक्ट को वसूली का हथियार बनने से रोकें, हाईकोर्ट की टिप्पणी

    By Jagran NewsEdited By: Siddharth Chaurasiya
    Updated: Thu, 10 Aug 2023 08:42 PM (IST)

    एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पोक्सो व एससी एसटी एक्ट के तहत कई मामलों में झूठी एफआइआर दर्ज कराई जाती है। ऐसे केस आरोपित को समाज में बेइज्जत करने और सरकार से मुआवजा लेने के लिए होते हैं। कोर्ट ने कहा यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ महिलाएं इस कानून का उपयोग पैसे वसूलने के हथियार के रूप में कर रही हैं।

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    हाईकोर्ट ने कहा कि पोक्सो व एससी, एसटी एक्ट के तहत कई मामलों में झूठी एफआइआर दर्ज कराई जाती है।

    विधि संवाददाता, प्रयागराज। एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि पोक्सो व एससी, एसटी एक्ट (POCSO, SC/ST Act) के तहत कई मामलों में झूठी एफआइआर दर्ज कराई जाती है। ऐसे केस आरोपित को समाज में बेइज्जत करने और सरकार से मुआवजा लेने के लिए होते हैं। कोर्ट ने कहा, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ महिलाएं इस कानून का उपयोग पैसे वसूलने के हथियार के रूप में कर रही हैं।

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    कोर्ट का राज्य और केंद्र को निर्देश

    इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव ने आजमगढ़ फूलपुर निवासी अजय यादव की अग्रिम जमानत अर्जी को निस्तारित करते हुए दिया है। कोर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस संवेदनशील मामले में केस झूठा पाए जाने पर जांच के बाद पीड़िता के खिलाफ धारा 344 की कार्यवाही करें और सरकार से बतौर मुआवजा लिए गए धन की पीड़िता से वसूली की जाए।

    कोर्ट ने 50 हजार का लगाया जुर्माना

    कोर्ट ने दुष्कर्म के आरोपित को सशर्त अग्रिम जमानत पर 50 हजार रुपये के निजी मुचलके व दो प्रतिभूति लेकर रिहा करने का भी आदेश दिया है। याची का कहना था कि कोई घटना हुई ही नहीं, उसने कोई अपराध किया ही नहीं। आठ साल पहले नाबालिग पीड़िता से शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में प्राथमिकी दर्ज कराई गई।

    पीड़िता के प्राथमिकी और पुलिस को दिए धारा 161 के बयान में विरोधाभास है। एक में कहा कि वर्ष 2012 में शारीरिक संबंध बनाए तो पुलिस को दिए बयान में कहा कि वर्ष 2013 में शारीरिक संबंध बनाए। वर्ष 2011 की घटना की प्राथमिकी 11 मार्च 2019 को दर्ज कराई गई। मेडिकल जांच में 28 मार्च 2019 को पीड़िता की आयु 18 वर्ष बताई गई।

    सह अभियुक्त दयालु यादव को अग्रिम जमानत मिल चुकी है। याची का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। उसे झूठा फंसाया गया है, जो अपराध कभी हुआ ही नहीं, उसके लिए उसे आरोपित किया गया है। कोर्ट ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण माना।