मान्यता : भगवान शिव ने किया था प्रयाग का नामकरण
पुराणों के अनुसार प्रयाग समस्त तीर्थो में सवरेत्तम और सर्वश्रेष्ठ माना गया है। देवताओं की यज्ञभूमि होने के कारण भी उसे प्रयाग, नाम से अभिहित किया गया।
इलाहाबाद (जेएनएन))। पुराणों के अनुसार संगमनगरी प्रयाग को समस्त तीर्थों में सर्वोत्तम और सर्वश्रेष्ठ माना गया है। देवताओं की यज्ञभूमि होने के कारण भी उसे प्रयाग, नाम से अभिहित किया गया। यज्ञ-यगादि और दान-पुण्य के सर्वथा अनुकूल एवं उपयुक्त समझकर ही स्वयं भगवान विष्णु और त्रिलोकपति शंकर ने इसका प्रयाग नामकरण किया।
ब्रह्मपुराण के अनुसार, प्रकृष्टत्वात् प्रयागोसौ प्राधान्याद्
राज शब्दवान: अर्थात अपने प्रकृष्टत्व या उत्कृष्टता के कारण यह प्रयाग है और प्राधान्य अर्थात प्रधानता के कारण राजशब्द से युक्त है। इसी आधार पर प्रयाग को प्रयागराज या तीर्थराज भी कहा जाता है।
स्कन्दपुराण के अनुसार-प्रकृष्टं सर्वयागेभ्य: प्रयागमिति कथ्यते, अर्थात जितने भी यज्ञ यागादि कर्म है उनमें सर्वोत्कृष्ट होने से इसे प्रयाग कहा जाता है।
दृष्ट्वा प्रकृष्टं यागेभ्य: पुष्टभ्यो दक्षिणादिभि:।
प्रयागमिति तन्नाम कृतं हरिहरादिभि:।।
उत्कृष्ट यागादि और दान-दक्षिणादि से परिवेषित देखकर विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं ने इसका प्रयाग नामकरण किया।
प्रयागराज के दर्शन, तीर्थाटन और सेवन से मनुष्य के त्रिविधतापों का शमन हो जाता है।
अग्नि पुराण में, मार्कण्डेय मुनि के अनुसार- भोग और मुक्ति को देने वाले इस प्रयाग के कल्याणकारी महात्म्य को मैं कहता हूं। जितने भी विष्णु, शंकर, ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि-मुनि, सरिताएं, सागर, तपस्वी, गन्धर्व और अप्सराएं हैं, वे सब इस प्रयागराज में विद्यमान हैं।
वक्ष्य प्रयागमाहात्म्यं मुक्तिमुक्तिप्रदंपरम्।
प्रयागे ये च विष्णवाआ, देव्य मुनिवरास्थित:। सरित: सागरा: सिद्धा: गन्धर्वाप्सरस्तथा।।
तीर्थराज प्रयाग का नाम सर्वश्रेष्ठ तीर्थ के रूप में विख्यात है। वह सभी तीर्थों के पुण्यफलों को देने वाला और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इस चतुर्वर्ग का प्रदाता है-
प्रथमं तीर्थराजं तु प्रयागरथं सुविश्रुतम्। कामिकं सर्वतीर्थानां धर्म कामार्थ मोक्षदम्।। (काशी खण्ड)
ब्रह्म ने जहां सैकड़ों यज्ञों से भी अधिक यज्ञों का संपादन किया है, उसे प्रयाग नाम से कहा गया है। यह स्थान सब प्रकार के पापों का विनाशक है। ब्रह्मक्षेत्र के रूप में यह प्रयाग तीनों लोकों में विश्रुत है।
ब्रह्मणा यत्र चेष्टं हि क्रतूनां च शतैरपि।
तत्प्रयागमिति ख्यातै सर्वपाप प्रणाशनम्। (वाराह पुराण)
जो व्यक्ति तीर्थराज को छोड़कर किसी अन्य तीर्थ से अपनी मनोकामनाओं को पूरा करने की इच्छा करता है वह इस विशाल भारत वर्ष में कहीं भी अपनी मनोकामना पूरी नहीं कर सकता है-
तीर्थराजं परित्यज्य योन्यस्मात्काम मिष्यते।
भारताख्ये महावर्षे से कामनापनुयात्स्फुटम् (स्कन्द पुराण)
मत्स्यपुराण में है कि-तीर्थराज प्रयाग के दर्शन नाम संकीर्तन एवं मुत्तिका स्पर्श द्वारा मनुष्य पापों से मुक्ति प्राप्त करता है।
दर्शनातस्य तीर्थस्य नाम संकीर्तनादपि।
मृत्तिकालम्भनाद्वापि नर: पापात् प्रमुच्यते।।
इसीलिए प्रयाग को तीर्थराज के रूप में पूज्य माना गया है तथा सर्वेषु लोकेषु प्रयागं पूजयेद बुध:।
पूज्यते तीर्थनाजस्तु सत्यमेव युधिष्ठिर:।।
कहा गया है-प्रयागं सप्रतिष्ठानं कम्बलाश्वतराकुभौ।
योगवत्ययवा चैषा वेदिरेषा प्रजापते:।
इसी पुराण में प्रयाग मण्डल की सीमा पांच योजन तक विस्तीर्ण कही गयी है।
पंच योजन विस्तीर्ण: प्रयागस्य तु मण्डलम्।।
यह प्रयाग मण्डल प्रतिष्ठानपुर झूंसी से लेकर वासुकिहृद तथा कम्बल एवं अश्वतर नागों के बहुमूलक नाग तक का क्षेत्र प्रयाग मण्डल था।
आप्रयागं प्रतिष्ठानाआत्पुरा वासुकेर्हृदात्।
कम्बलापूर्वतरौ नागौ नागश्च बहुमूलके:।।
पृथ्वी पर साठ करोड़ दस सहस्र तीर्थ बनाये गए हैं उन सभी की स्थिति इस तीर्थराज प्रयाग में होती है।
दशतीर्थ सहस्राणि षष्टिकोट्यरथापरा:।
तेषां सन्निध्यमत्रैव तत्रस्तु कुरुनंदन।।
प्रयाग शब्द की व्युत्पत्ति- प्र उपसर्ग पूर्वक यज् धातु से प्रयाग शब्द की निष्पत्ति होती है जिसका अभिप्राय है-प्रकृष्टो भागो स: प्रयाग: प्र का अर्थ है प्रकृष्ट या उत्कृष्ट।
पुराणों के अनुसार प्रयाग समस्त तीर्थो में सवरेत्तम और सर्वश्रेष्ठ माना गया है। देवताओं की यज्ञभूमि होने के कारण भी उसे प्रयाग, नाम से अभिहित किया गया। यज्ञ-यगादि और दान-पुण्य के सर्वथा अनुकूल एवं उपयुक्त समझकर ही स्वयं भगवान विष्णु और त्रिलोकपति शंकर ने इसका प्रयाग नामकरण किया।
साभार -डा. राजेंद्र त्रिपाठी 'रसराज'
(एसोसिएट प्रोफेसर इलाहाबाद डिग्री कालेज)।
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