Freedom Fighter : 1857 में वह आज ही का दिन था, खुसरोबाग में अंग्रेजों को लियाकत अली ने दिया था चकमा
खुसरोबाग को लियाकत ने स्वतंत्र सरकार चलाने का मुख्यालय बनाया था। यहां आज ही के दिन स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने अंग्रेजी सेना से लोहा लेते हुए चकमा देकर निकल गए थे।
प्रयागराज, [अमरदीप भट्ट]। फ्लैश बैक में जाइए, करीब 163 साल पहले की बात है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-1857 की आंधी पूरे देश में चल रही थी। इसी दौरान आज (17 जून) का ही दिन था जब ब्रिटिश सरकार के खिलाफ इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में विद्रोही सरकार चला रहे मौलवी लियाकत अली को जनरल नील ने घेर लिया था। स्थान था खुसरोबाग। दोनों तरफ से युद्ध हुआ, जिसमें दोनों ओर से लोग मारे गए थे। रात होने पर लियाकत अली ने अंग्रेजों को चकमा देकर यहां से निकलकर कानपुर जा पहुंचे थे।
अंग्रेज अफसरों ने उन्हें पकडऩे के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था
मौलवी लियाकत अली का अपने देश को अंग्रेजों की गुलामी से महफूज रखने का जुनून देखते हुए अंग्रेज अफसरों ने उन्हें पकडऩे के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। उनके न मिलने पर तत्कालीन शहर कोतवाल ने उन्हें बागी कहकर जिंदा या मुर्दा पकडऩे का इश्तहार भी जगह-जगह लगवाया था।
मौलवी लियाकत ने इलाहाबाद में स्वतंत्रता आंदोलन की जगाई थी
मूलरूप से कौशांबी के महगांव में जन्मे मौलवी लियाकत अली ने 1857 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मेरठ से क्रांति की ज्वाला जलने पर इलाहाबाद में स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाई थी। आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के बाद खुद को इलाहाबाद में मुगलिया सल्तनत का सूबेदार घोषित करते हुए विद्रोही रूप में स्वतंत्र सरकार का गठन कर दिया था। पांच जून को इलाहाबाद में राष्ट्रीय आक्रोश प्रखर हुआ।
गतिविधियों के संचालन को खुसरोबाग को मुख्यालय बनाया
सरकार की सभी गतिविधियों का संचालन करने के लिए खुसरोबाग को मुख्यालय बनाया। 11 जून को जनरल नील दल-बल लेकर ब्रिटिश सत्ता का प्रभाव जमाने के लिए इलाहाबाद पहुंचा। 17 जून को उसने खुसरोबाग में चल रही स्वतंत्र सरकार को बेदखल करने के लिए कार्रवाई शुरू कर दी। उसके क्रूर सैनिकों और मौलवी लियाकत अली के रणबांकुरों में टकराव हो गया। रात होने पर मौलवी लियाकत अली खुसरोबाग से निकलने में कामयाब हो गए और कानपुर पहुंच गए। इसके बाद मुंबई भी गए जहां उन्हें अंग्रेजों के सैनिकों ने गिरफ्तार कर काला पानी की जेल भेज दिया।
मुकदमे में लगे यह आरोप
क्षेत्रीय अभिलेखागार में उपलब्ध रिकॉर्ड बताते हैं कि मौलवी लियाकत अली के खिलाफ कोतवाली थाने में मुकदमा दर्ज हुआ था। उन पर संगठित विद्रोह करने, विद्रोही सरकार बनाने, सरकारी संपत्ति लूटने और ब्रिटिश अफसरों/नागरिकों की हत्या का आरोप लगाया गया। उनकी गिरफ्तारी में असफल होते देख तत्कालीन शहर कोतवाल ने उन्हें ङ्क्षजदा या मुर्दा पकडऩे का इश्तेहार जगह-जगह लगवा दिया था।
-राकेश वर्मा, प्राविधिक सहायक इतिहास, क्षेत्रीय अभिलेखागार प्रयागराज
संग्रहालय में है निशानी
मौलवी लियाकत अली ने काला पानी की सजा के दौरान अंडमान दीप में राजनैतिक बंदी के रूप में अपनी इहलीला समाप्त की। उन्होंने जेल में जो कुर्ता और पायजामा पहना था, उसे उनके वंशजों ने 1956 में पंडित जवाहरलाल नेहरू को आनंद भवन में भेंट किया था। साथ में लियाकत अली की तलवार भी भेंट की। पं. नेहरू ने कुछ समय बाद ये वस्तुएं इलाहाबाद संग्रहालय के सिपुर्द कर दिया, जिन्हें आज भी सुरक्षित रखा गया है।
-डॉ सुनील गुप्ता, निदेशक इलाहाबाद राष्ट्रीय संग्रहालय
खुसरोबाग में फहराया था हरा झंडा
मौलवी लियाकत अली ने खुद को मुगलिया सल्तनत का सूबेदार घोषित कर खुसरोबाग में मुगलिया सल्तनत का हरा झंडा फहराया था। आजादी की लड़ाई में प्रतिभाग किया। कुछ दिनों बार जनरल नील इलाहाबाद आ धमका। उसने कत्लेआम शुरू कर दिया। लोगों को पेड़ पर लटकाकर फांसी दी। खुसरोबाग खाली कराने की कार्रवाई के दौरान लियाकत अली वहां से बच निकले थे।
-प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी, मध्य कालीन एवं आधुनिक इतिहास विभाग इविवि के प्रोफेसर
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