प्रयागराज, जागरण संवाददाता। ये उर्दू बज्म है और मैं तो हिंदी मां का जाया हूं, जबानें मुल्क की बहनें हैं ये पैगाम लाया हूं...। मुझे दुगनी मुहब्बत से सुनो उर्दू जबां वालों, मैं हिंदी मां का बेटा हूं, मैं घर मौसी के आया हूं...। यह बात कवि ने उर्दू के लिए कही है लेकिन अंग्रेजी के विद्वानों पर भी यह लागू होती है। उन्हें जो पहचान मिली वह हिंदी के मंच से। इसकी बानगी पूरब के आक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के अतीत के पन्ने पलटने पर मिल सकती है।

फिराक को उच्‍च सम्‍मान हिंदी से मिला

इलाहाबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डाक्टर चित्तरंजन कुमार बताते हैं कि 1930 से 1959 तक अंग्रेजी विभाग में शिक्षक रहे रघुवीर सहाय (फिराक गोरखपुरी) ने हिंदी को शिखर पर ले जाने में अविस्मरणीय योगदान दिया। उन्हें पद्मभूषण, ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार भी हिंदी ने ही दिलाया।

हरिवंश राय बच्‍चन की मधुशाला आज भी लोगों की पसंदीदा है

डाक्‍टर चित्‍तरंजन कहते हैं कि 1942 से 1952 तक हरिवंशराय बच्‍चन किसी पहचान के मोहताज नहीं। उनका नाम लेते ही मधुशाला आज भी लोगों के जेहन में ताजा हो जाती है। हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डाक्टर संतोष कुमार सिंह बताते हैं कि विजय देवनारायण साही इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में 1970 में रीडर नियुक्त हुए। वह 1978 में प्रोफेसर बने। अंग्रेजी का शिक्षक होकर वह हिंदी में ही रच-बच गए।

अंग्रेजी के इन विद्वानों ने भी हिंदी के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी

वहीं 1955 से 1993 तक सेवारत रहे प्रोफेसर अमर सिंह, प्रोफेसर केजी श्रीवास्तव, प्रोफेसर एमएम दास, प्रोफेसर राजनाथ का भी नाम इसी श्रेणी में आता है। डाक्टर संतोष कहते हैं कि अंग्रेजी के इन विद्वानों ने हिंदी के क्षेत्र में न सिर्फ अपनी अमिट छाप छोड़ी बल्कि विश्वविद्यालय को वैश्विक पटल पर पहचान दिलाई।

 

Edited By: Brijesh Srivastava