विधि संवाददाता, प्रयागराज: गंगा प्रदूषण को लेकर हाई कोर्ट में दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की। सरकार की तरफ से पेश हुए अपर महाधिवक्ता अजीत कुमार सिंह से कोर्ट ने पूछा कि जल की शुद्धता के मामले में क्या किया गया? उन्होंने सरकार का पक्ष रखा। न्याय मित्र, वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण कुमार गुप्ता ने कहा, ‘गंगा की स्वच्छता के नाम पर अधिकारी केवल पैसे खर्च कर रहे हैं। गंगा स्वच्छ नहीं हो रही हैं।’ उन्होंने कोर्ट को बताया कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की शोधन क्षमता से दूना पानी आ रहा। 60 प्रतिशत सीवर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़े गए हैं, शेष 40 प्रतिशत सीवर सीधे गंगा में गिर रहा है। नालों के बायोरेमिडियल शोधन की अधूरी प्रणाली से खानापूरी की जा रही। केवल गंगा में पानी छोड़ने मात्र से गंगा साफ नहीं होगी।

राजापुर, नैनी सहित कई ट्रीटमेंट प्लांट से फ्लो 120 एमएलडी है और क्षमता 60 एमएलडी की है। एसटीपी से भी पानी शोधित नहीं हो पा रहा है। नगर निगम केवल एक ड्रम रखकर खानापूर्ति कर रहा है। माघ के दौरान केवल 4000 क्यूसेक पानी छोड़ने से गंगा का जल शुद्ध नहीं हो पाएगा। अपर महाधिवक्ता अजीत कुमार सिंह से कोर्ट ने पूछा कि जल की शुद्धता के मामले में क्या किया गया? अपर महाधिवक्ता ने बताया कि कोर्ट के आदेश के तहत गंगा में गिर रहे नाले टैप्ड करा दिए गए हैं। मेला क्षेत्र को पालीथिन मुक्त करने के लिए कार्रवाई की जा रही है।

विजय चंद्र श्रीवास्तव ने बताया कि दो दिन पहले मुख्य सचिव और डीजीपी मेले की तैयारियों की समीक्षा करने के लिए आए थे लेकिन उन्होंने गंगाजल के शुद्धिकरण पर कोई करवाई नहीं की। ऐसा लगता है शासन चिंतित नहीं है। कल्पवासी गंदे और काले पानी में स्नान के लिए मजबूर हैं। मुख्य सचिव से इस बारे में पूछा जाए। अधिवक्ता शैलेश सिंह ने कहा कि कोर्ट ने 21 जनवरी, 2021 को अपने आदेश में गंगा जल की शुद्धता, एसटीपी और ड्रेनेज में सुधार के लिए कहा था। इस पर अपर महाधिवक्ता ने कोर्ट के पिछले आदेश की अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत किया। कोर्ट ने उसे रिकार्ड पर लेते हुए पूछा कि गंगा जल शुद्धिकरण के मामले में क्या किया गया। महाधिवक्ता को पक्ष रखने का आदेश दिया गया था, वह कहां है? बताया गया कि वह बाहर हैं, इस पर सुनवाई स्थगित कर दी गई।

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