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    Happy Mother’s Day 2022: फैशन डिजाइनर सुदीपा मित्रा को मिला मुकाम, मां का सफलता में है योगदान

    By Brijesh SrivastavaEdited By:
    Updated: Sun, 08 May 2022 09:07 AM (IST)

    Happy Mother’s Day 2022 प्रयागराज की युवा फैशन डिजाइनर सुदीपा मित्रा कहती हैं कि मेरे जीवन के हर क्षेत्र में मां का विशेष योगदान है। कम उम्र में मेरे नाना का साया उठ गया था। इस वजह से वक्त ने उन्हें बहुत मजबूत बनाया। इसका असर मेरी परवरिश पर पड़ा।

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    शुक्ला मित्रा ने फैशन डिजाइनर युवा बेटी को बताया कैसे समाज में मुकाम बनाएं। जिंदगी को मां ने आसान बनाया।

    प्रयागराज, [शरद द्विवेदी]। बुलंद जज्बेे व समर्पित भाव से फैशन डिजाइनिंग के क्षेत्र में सुदीपा मित्रा ने पहचान बनाई है। शहर के टैगोर टाउन निवासी सुदीपा कोलकाता की स्वयं सहायता समूह 'परिपूर्णा' से जुड़कर काम कर रही हैं। कपड़ों में काथा (कढ़ाई) वर्क व पेंटिंग कराकर उसकी बिक्री के लिए प्रदर्शनी लगवाती हैं। फैशन मेलों में प्रदर्शनी आयोजित कराने के साथ बड़े संस्थानों में परिधानों की सप्लाई कराती हैं। उनके साथ 18 महिलाएं जुड़ी हैं।

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    सुदीपा मित्रा बोलीं- मां सफलता की रात में संबल हैं : कलेक्शन तैयार करने, प्रदर्शनी के दौरान बड़े ग्राहकों से मिलने अथवा अपने संपर्क बढ़ाने के लिए फैक्ट्री या स्टाल से जुड़े हर काम में सुदीपा की मां शुक्ला मित्रा का पूरा सहयोग रहता है। इस युवा डिजाइनर का कहना है कि मां आगे बढ़कर हर जिम्मेदारी, तन्मयता से संभालती हैं। मेरे आगे बढऩे की राह में शारीरिक-मानसिक रूप से संबल बनती हैं। किसी सवाल से घबराती नहीं, परंपराओं को आड़े नहीं आने देतींं।

    मां मेरा स्वाभिमान व आत्मबल : सुदीपा को मां से बेहद जुड़ाव है। कहती हैं कि मेरे जीवन के हर क्षेत्र में मां का विशेष योगदान है। कम उम्र में उनके पिता यानी मेरे नाना का साया उठ गया था। इस वजह से वक्त ने उन्हें बहुत मजबूत बनाया। इसका असर मेरी परवरिश पर पड़ा। उन्होंने सदैव ही दाकियानूसी सोच के खिलाफ मेरा साथ दिया है। मैं छोटी थी तबसे मेरी हर इच्छा का समर्थन करते हुए बढऩे के लिए प्रेरित करती रहीं। संगीत की विभिन्न प्रतियोगिता के आडिशन में अपने साथ लेकर गईं। जनसेवा के लिए मैंने आगाज फाउंडेशन की नींव रखी तो मां हर कदम पर साथ रहीं। कोविड काल में संस्था की ओर से राशन किट, मास्क, सैनिटाइजर व पका भोजन वितरण में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया। वह रोजाना 50 से 100 लोगों का भोजन स्वयं बनाती थीं।