कोरोना महामारी के समय शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार होना चाहिए : डॉ. शक्ति
डॉ. शक्ति पांडेय ने बताया कि धर्मशास्त्र में तीन प्रकार से अंतिम संस्कार का विधान है। इसमें दाह संस्कार सबसे उत्तम बताया गया है। हमारे स्थूल शरीर में पंच प्राण और पंच उप प्राण होते हैं। शरीर में इन सब का अपना अलग-अलग स्थान होता है।
प्रयागराज, जेएनएन। कोरोना महामारी की भयावह स्थिति व मृतकों का नियमानुसार अंतिम संस्कार नहीं हो रहा है। इस पर कैवल्य धाम आश्रम में हुई वैचारिक गोष्ठी में चिंता जताई गई। मुख्य वक्ता सनातन धर्म की जानकार डॉ. शक्ति पांडेय ने कहा कि पार्थिव शरीर को इधर-उधर गाडऩा अथवा फेंकना अनुचित है। अंतिम संस्कार शास्त्रीय परंपरा के अनुरूप होना चाहिए। मृतक का अंतिम संस्कार शास्त्र सम्मत विधि से न करने पर उसकी आत्मा के भटकने का भय रहता है। ऐसी आत्माएं परिवार समाज के लिए विध्वंसक होती है।
तीन प्रकार से होते हैं अंतिम संस्कार
डॉ. शक्ति पांडेय ने बताया कि धर्मशास्त्र में तीन प्रकार से अंतिम संस्कार का विधान है। इसमें दाह संस्कार सबसे उत्तम बताया गया है। हमारे स्थूल शरीर में पंच प्राण (प्राण, व्यान, उदान, समान, अपान) और पंच उप प्राण (देवदत्त, कृक्लक, कूर्म, धनंजय, कृक्लाश) होते हैं। शरीर में इन सब का अपना अलग-अलग स्थान होता है। मृत्यु के उपरांत धनंजय प्राण शरीर में ही रह जाता है यदि कुछ दिन रखकर शव की रक्षा की जाए तो नाखून (लोन) और केस में वृद्धि होती है। इसके लिए धनंजय वायु ही उत्तरदायी होती है। यह शरीर से दाह कर्म के बिना निकल नहीं पाती।
तृतीय विधि मृतक शरीर को जमीन में गाडऩे की है
उन्होेंने बताया कि दाह संस्कार के उपरांत नव (9) प्राण इस उप प्राण को लेकर आगे का लोकांतरण करते हैं। जबकि जल समाधि के जरिए भी अंतिम संस्कार होता है। हालांकि वह ऋषि-मुनियों, साधकों का दिया जाता है। तृतीय विधि मृतक शरीर को जमीन में गाडऩे की है। जमीन में गाडऩे पर शरीर की सप्त धातु मांस, मज्जा इत्यादि अस्थि को छोड़कर धीरे-धीरे गल जाती हैं, यह क्रिया कई वर्षों में होती है। कुछ धर्मावलंबी इस विधि को अपनाते हैं।
बोलीं कि दाह संस्कार अत्यधिक आवश्यक है
उन्हाेंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में दाह संस्कार अत्यधिक आवश्यक है यदि दाह संस्कार नहीं होता तो यह संक्रमण के समान अपने परिवार, कुल, समाज आदि के लिए विध्वंसक बन जाएगा। इस विपत्ति के समय भारतीय संस्कृति में उल्लिखित हवन विधि को अपनाना एक श्रेयकर मार्ग होगा। साथ ही परमात्मा का स्मरण औषधि के रूप में कार्य करेगा। अध्यक्षता टीकरमाफी आश्रम पीठाधीश्वर स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी व संयोजन हर्षचैतन्य ब्रह्मचारी ने किया।
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