प्रयागराज, जेएनएन। भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा, तिन्हहि राम पद अति अनुरागा-तापस सम दम दया निधाना, परमारथ पथ परम सुजाना। गोस्वामी तुलसीदास की रचित श्रीराम चरित मानस की यह चौपाई बताती है कि देवराज इंद्र से आयुर्वेद का ज्ञान धरती पर सबसे पहले प्राप्त करने वाले ऋषि भरद्वाज प्रयाग में बसे थे। अनुमानित तौर पर वहीं जिसे कालांतर में नाम मिला भरद्वाज आश्रम।

पूरा मोहल्ला ही कहलाने लगा भरद्वाज आश्रम

वर्तमान में पूरा मोहल्ला ही भरद्वाज आश्रम के नाम से जाना जाता है। यहां के वाशिंदे भी जैसे मुनि भरद्वाज के नाम को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। हर कदम पर मंदिर, वर्ग अधिकांश ब्राह्मण बाहुल्य। मोहल्ले में कदम रखते ही पर्यटकों, तीर्थयात्रियों को जैसे अपने आसपास मुनि भरद्वाज की छत्रछाया मिलती महसूस होती है। इस मुहल्ले का नामकरण ऐतिहासिक ही नहीं पौराणिक भी है। अब तो मोहल्ले का विस्तार भी हो गया है। बालसन चौराहा ठीक बगल में है और नगर निगम ने पिछले दिनों बालसन चौराहे को भी महर्षि भरद्वाज के नाम पर कर दिया।

आए थे भगवान श्रीराम

भरद्वाज आश्रम में त्रेतायुग में भगवान श्रीराम अर्धांगिनी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ आए थे। तब उन्हें ठहराने के साथ ही महर्षि भरद्वाज ने चित्रकूट जाने का रास्ता भी बताया था। मंदिर के पुजारी भारतनाथ गोस्वामी कहते हैं कि इस मोहल्ले की खासियत यही है जो इसका संबंध सीधे पुराणों से है। नगर क्षेत्र में किसी ऋषि या मुनि के नाम पर एक मोहल्ला है। या फिर गंगापार झूंसी में दुर्वासा ऋषि का आश्रम। भरद्वाज आश्रम में भरतकुंड और सीता कुंड भी हैं। धार्मिक मान्यता व आस्था है कि भगवान श्रीराम ने भरतकुंड के पास यज्ञ किया था। पुजारी भारतनाथ की मानें तो यहां शिवालय की स्थापना त्रेतायुग में महर्षि भरद्वाज के समय जैसी थी वैसी अब भी है। इसका दर्शन करने के लिए श्रद्धालु देश भर से आते हैं। हालांकि महर्षि भरद्वाज के महाविद्यालय परिसर का अस्तित्व अब लगभग मिट गया है।

Edited By: Ankur Tripathi