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    शमशेर हिंदी और उर्दू के 'दोआब'

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    Updated: Fri, 18 Nov 2011 01:13 PM (IST)

    वरिष्ठ संवाददाता, इलाहाबाद : प्रगतिशील चिंतक, कवि शमशेर बहादुर सिंह हिंदी और उर्दू के 'दोआब' थे। हिंदी में उन्होंने जो गजलें कीं वह उर्दू मिजाज की हैं। आज यह दोआब शुष्क हो चला है। इसे पुन: जीवंत बनाने की जरूरत है। इसके लिए शमशेर को और उनकी कविताओं को किसी 'वाद' के दायरे में बांधकर नहीं देखना होगा। शमशेर मूलत: कवि हैं और उनकी कविताओं में सौन्दर्य बोध के साथ-साथ देश व समाज की चिंता भी दिखाई पड़ती है। यह चिंता बुधवार को हिन्दुस्तानी एकेडेमी में आयोजित गोष्ठी में प्रगतिशील लेखकों के वक्तव्यों में भी परिलक्षित हुई। शमशेर के बहाने प्रतिबद्ध साहित्यकारों ने नए रचनाकारों को सचेत भी किया गया। कार्यक्रम का आयोजन प्रगतिशील लेखक संघ इलाहाबाद की ओर से शमशेर बहादुर सिंह की शताब्दी वर्ष के मौके पर किया गया।

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    गोष्ठी का उद्घाटन करते हुए प्रख्यात आलोचक प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि शमशेर पर इलाहाबाद का खास हक है क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी का बेहतरीन हिस्सा यहीं बिताया था। वह सचमुच एक कवि हैं। उनकी कविता में संवेदना मुखर होकर सामने आती है। सौन्दर्यबोध की एक नई परिभाषा दी। वह शुद्ध अर्थो में इहलौकिक और भौतिकवादी कवि हैं।

    पटना से आए कवि अरुण कमल ने कहा कि शमशेर को किसी वाद में बांधना उचित नहीं। वाद और विचारधारा से बड़ी चीज दर्शन होती है और दर्शन से बड़ी है उनकी जीवन दृष्टि। महाकवि निराला के बाद शमशेर जैसी सादगी और गहनता अन्य कवियों में नहीं दिखाई पड़ती। अमूर्त और जड़ को भी मूर्तमान और गतिमान बनाना उनकी कवित्व शैली का विशेष गुण था।

    प्रो. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि शमशेर विचारधारात्मक स्तर पर अज्ञेय तथा बच्चन के करीब लगते हैं। संयोजक प्रो. अली अहमद फातमी ने कहा कि उनकी गजलों के शब्दों की तहजीब उन्हें उर्दू के ज्यादा करीब खड़ा करती है। शमशेर हिंदी के उन कवियों में हैं जिनकी पूरी पृष्ठभूमि, तालीम उर्दू है। प्रियदर्शन मालवीय ने शमशेर के चित्रकार मन पर भी प्रकाश डाला। वह एक अच्छे चित्रकार भी थे। कार्यक्रम का संचालन अविनाश मिश्र व सूर्यनारायण ने किया। प्रो. अली प्रगतिशील लेखक संघ के जिलाध्यक्ष एहतराम इस्लाम ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस मौके कामरेड जियाउल हक, प्रो. ओपी मालवीय, डा. अशफाक हुसैन, अनीता गोपेश, हरीशचन्द्र द्विवेदी, नसीम अंसारी, विवेक निराला, डा. महेन्द्र राजा जैन, सुरेन्द्र राही, असरार गांधी, अजीत पुष्कल, श्लेष गौतम आदि उपस्थित रहे।

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