आपरेटरों की कमी से जूझ रहे नलकूप, किसान भी हलकान Aligarh news
रबी की फसलों से निपटे किसान जायद की तैयारी कर रहे हैं। तापमान भी बढ़ने लगा है। लेकिन सिंचाई को लेकर सरकारी विभाग अभी भी उदासीन हैं। जनपद में नलकूप आपरेटरों की भारी कमी है। बीते साल यह मुद्दा उठाया गया प्रस्ताव भी तैयार कर लिया।

अलीगढ़, जेएनएन : रबी की फसलों से निपटे किसान जायद की तैयारी कर रहे हैं। तापमान भी बढ़ने लगा है। लेकिन, सिंचाई को लेकर सरकारी विभाग अभी भी उदासीन हैं। जनपद में नलकूप आपरेटरों की भारी कमी है। बीते साल यह मुद्दा उठाया गया, प्रस्ताव भी तैयार कर लिया। मगर कुछ हो न सका। जो आपरेटर उपलब्ध हैं, उन पर चार-चार नलकूपों की जिम्मेदारी है। समय पर सरकारी नलकूपों का संचालन नहीं हो पाता। ऐसी परिस्थितियों में किसान परेशान हैं।
820 सरकारी नलकूप हैं जिले में
जनपद में 820 सरकारी नलकूप हैं और आपरेटर कुल 190। इन्हीं पर सरकारी नलकूपों के संचालन की जिम्मेदारी है। जबकि, नलकूप आपरेटर के 459 पद स्वीकृत हैं। वर्षों से नई भर्ती नहीं हुई। जनपद में 5225 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई सरकारी नलकूपों से होती है। जबकि, 270670 हेक्टेयर में निजी नलकूपों से सिंचाई हो रही है। 64600 निजी नलकूप यहां लगे हुए हैं। नहरों के जरिए 26860 हेक्टेयर में सिंचाई होती है। ये आंकड़े हर साल शासन को भेजे जाते हैं। साधन गिनाए जाते हैं, संसाधनों की कमी भी बताई जाती है। लेकिन, कमियों को पूरा नहीं किया जा सका। हालांकि, सिंचाई की अन्य तकनीकों पर जरूर जोर दिया जा रहा है, जिससे किसानों को हर तरह से लाभ है। माइक्रो इरिगेशन प्रणाली (सूक्ष्म सिंचाई) इन्हीं में एक है। इसमें ड्रिप इरिगेशन (बूंद-बूंद सिंचाई), माइक्रो स्प्रिंकल (सूक्ष्म फव्वारा), लोकलाइज इरिगेशन (पौधे की जड़ को पानी देना) आदि तरीके हैं।
सूक्ष्म सिंर्चाई पर जोर
जिला उद्यान अधिकारी एनके साहनिया बताते हैं कि सूक्ष्म सिंचाई से 48 फीसद पानी की बचत होती है, ऊर्जा की खपत भी कम होगी। इसके अलावा 40 फीसद मजदूरी घट जाएगी, पानी के साथ फर्टिलाइजर का घोल मिला देने से 20 फीसद तक खाद की बचत होगी। उत्पादन में 40 फीसद तक वृद्धि हो सकती है। उन्होंने बताया कि सिंचाई की इस तकनीक को किसान पसंद कर रहे हैं। कई किसानों के आवेदन आ चुके हैं। सरकार सूक्ष्म सिंचाई सयंत्र पर किसानों काे अनुदान दे रही है। इस प्रणाली के लगने के बाद किसानों को नलकूप, नहरों के भरोसे नहीं रहना होगा। पौधों को पर्याप्त मात्रा में पानी मिल सकेगा। किसानों की लागत भी घटेगी।
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