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    स्वास्तिक से शुरू होते हैं शुभ कार्य, जानिये स्वस्तिक का लाभ, उपाय, प्रभाव और महत्व

    By Prateek GuptaEdited By:
    Updated: Mon, 10 Dec 2018 05:38 PM (IST)

    विश्व के विभिन्न देशों ने भी माना है स्वास्तिक का महत्व। जर्मन और फ्रांस कर रहे यंत्र बनाकर अध्ययन।

    स्वास्तिक से शुरू होते हैं शुभ कार्य, जानिये स्वस्तिक का लाभ, उपाय, प्रभाव और महत्व

    आगरा, जेएनएन। किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले हिन्दू धर्म में स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर उसकी पूजा करने का महत्व है। मान्यता है कि ऐसा करने से कार्य सफल होता है। स्वास्तिक के चिन्ह को मंगल प्रतीक भी माना जाता है। धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार स्वास्तिक शब्द को सु और अस्ति का मिश्रण योग माना जाता है। यहां सु का अर्थ है शुभ और अस्ति से तात्पर्य है होना। अर्थात स्वास्तिक का मौलिक अर्थ है शुभ हो, कल्याण हो। सनातन परंपरा में विवाह, मुंडन, संतान के जन्म और पूजा पाठ के विशेष अवसरों पर स्वास्तिक का चिन्ह अवश्य ही बनता है।

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    स्वास्तिक की हर रेखा का है विशेष महत्व

    पंडित वैभव जोशी बताते हैं कि स्वस्तिक का यह चिन्ह क्या दर्शाता है, इसके पीछे ढेरों तथ्य हैं। स्वास्तिक में चार प्रकार की रेखाएं होती हैं, जिनका आकार एक समान होता है।

    आम लोगों का मानना है कि यह रेखाएं चार दिशाओं- पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं। लेकिन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह रेखाएं चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतीक हैं। कुछ यह भी मानते हैं कि यह चार रेखाएं सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के चार सिरों को दर्शाती हैं। इसके अलावा इन चार रेखाओं की चार पुरुषार्थ, चार आश्रम, चार लोक और चार देवों यानी कि भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश (भगवान शिव) और गणेश से तुलना की गई है।

    भगवान विष्णु की नाभि माना जाता है बिंदु

     स्वास्तिक की चार रेखाओं को जोडऩे के बाद मध्य में बने बिंदु को भी विभिन्न मान्यताओं द्वारा परिभाषित किया जाता है। मान्यता है कि यदि स्वास्तिक की चार रेखाओं को भगवान ब्रह्मा के चार सिरों के समान माना गया है, तो फलस्वरूप मध्य में मौजूद बिंदु भगवान विष्णु की नाभि है, जिसमें से भगवान ब्रह्मा प्रकट होते हैं। इसके अलावा यह मध्य भाग संसार के एक धुर से शुरू होने की ओर भी इशारा करता है।

    घड़ी का आकार लेकर समय की पाबंदी का संदेश

    स्वास्तिक की चार रेखाएं एक घड़ी की दिशा में चलती हैं, जो संसार के सही दिशा में चलने का प्रतीक है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यदि स्वास्तिक के आसपास एक गोलाकार रेखा खींच दी जाए, तो यह सूर्य भगवान का चिन्ह माना जाता है। वह सूर्य देव जो समस्त संसार को अपनी ऊर्जा से रोशनी प्रदान करते हैं।

    विभिन्न धर्मों में भी मान्य है स्वास्तिक

    पंडित वैभव जोशी के अनुसार हिन्दू धर्म के अलावा स्वास्तिक का और भी कई धर्मों में महत्व है। बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है। यह भगवान बुद्ध के पग चिन्हों को दिखाता है, इसलिए इसे इतना पवित्र माना जाता है। यही नहीं, स्वास्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है।

    हिन्दू धर्म से भी ऊपर यदि स्वास्तिक ने कहीं मान्यता हासिल की है तो वह है जैन धर्म। हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा महत्व स्वास्तिक का जैन धर्म में है।

    जैन धर्म में यह सातवं जिन का प्रतीक है, जिसे सब तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के नाम से भी जानते हैं। श्वेताम्बर जैनी स्वास्तिक को अष्ट मंगल का मुख्य प्रतीक मानते हैं।

    लाल रंग से क्यों बनाते हैं स्वास्तिक

    केवल लाल रंग से ही स्वास्तिक क्यों बनाया जाता है? इस सवाल का जवाब देते हुए पंडित वैभव जोशी कहते हैं कि भारतीय संस्कृति में लाल रंग का सर्वाधिक महत्व है और मांगलिक कार्यों में इसका प्रयोग सिन्दूर, रोली या कुमकुम के रूप में किया जाता है। लाल रंग शौर्य एवं विजय का प्रतीक है। लाल रंग प्रेम, रोमांच व साहस को भी दर्शाता है। धार्मिक महत्व के अलावा वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाल रंग को सही माना जाता है।

    लाल रंग व्यक्ति के शारीरिक व मानसिक स्तर को शीघ्र प्रभावित करता है। यह रंग शक्तिशाली व मौलिक है। हमारे सौर मण्डल में मौजूद ग्रहों में से एक मंगल ग्रह का रंग भी लाल है। यह एक ऐसा ग्रह है जिसे साहस, पराक्रम, बल व शक्ति के लिए जाना जाता है।

    विश्व ने भी माना स्वास्तिक का महत्व

    दुनियाभर के वैज्ञानिकों ने तूफान, बरसात, जमीन के अंदर पानी, तेल के कुएं आदि की जानकारी के लिए कई यंत्रों का निर्माण किया। इन यंत्रों से प्राप्त जानकारियां पूर्णत: सत्य एवं पूर्णत: असत्य नहीं होतीं। पंडित वैभव जोशी कहते हैं कि जर्मन और फ्रांस ने यंत्रों का आविष्कार किया है, जो हमें ऊर्जाओं की जानकारी देता है। उस यंत्र का नाम बोविस है। इस यंत्र से स्वस्तिक की ऊर्जाओं का अध्ययन किया जा रहा है।

    वैज्ञानिकों ने उसकी जानकारी विश्व को देने का प्रयास किया है। विधिवत पूर्ण आकार सहित बनाए गए एक स्वस्तिक में करीब एक लाख बोविस ऊजाकं रहती हैं। जानकारियां बड़ी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक है।

    आदिकाल से चली आ रही है स्वास्तिक की परंपरा

    पंडित वैभव जोशी के अनुसार चार हजार साल पहले सिंधु घाटी की सभ्यताओं में भी स्वास्तिक के निशान मिलते हैं। बौद्ध धर्म में स्वास्तिक का आकार गौतम बुद्ध के हृदय स्थल पर दिखाया गया है। मध्य एशिया देशों में स्वस्तिक का निशान मांगलिक एवं सौभाग्य सूचक माना जाता है।

    स्वास्तिक बनाते समय रखें शुद्धता का ध्यान

    शरीर की बाहरी शुद्धि करके शुद्ध वस्त्रों को धारण करके ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए (जिस दिन स्वास्तिक बनाएं) पवित्र भावनाओं से नौ अंगुल का स्वास्तिक 90 डिग्री के एंगल में सभी भुजाओं को बराबर रखते हुए बनाएं।

    केसर, कुमकुम, सिन्दूर और तेल के मिश्रण से अनामिका अंगुली से ब्रह्म मुहूर्त में विधिवत बनाने पर घर के वातावरण में कुछ समय के लिए अच्छा परिवर्तन महसूस किया जा सकता है। भवन या फ्लैट के मुख्य द्वार पर एवं हर रूम के द्वार पर अंकित करने से सकारात्मक ऊर्जाओं का आगमन होता है।