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    Sanjhi Art: अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन को पीएम मोदी ने भेंट की जो सांझी कृति, कलाकार की छठीं पीढ़ी ने सहेजी वो विरासत

    By Prateek GuptaEdited By:
    Updated: Thu, 26 May 2022 11:54 AM (IST)

    मथुरा के गीलू राम के परिवार में छह पीढ़ियों से बन ही पेपर कटिंग सांझी। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को भेंट की गई सांझी की कृति से बढ़ी कलाकार परिवार की चर्चा। अमेरिकी राष्ट्रपति को जो सांझी कृति भेंट की गई है वह चैनसुख दास के हाथों से बनी थी।

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    पेपर कटिंग के साथ बारीक कलाकारी से बनी सांझी कृति।

    आगरा, जागरण टीम। सांझी ब्रज की लोक पंरपरा है। कृष्णकालीन इस परंपरा को पूरी दुनिया में मान मिला है। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को ब्रज की प्रसिद्ध सांझी की कृति भेंट की, तो इस कला पर फिर चर्चा शुरू हो गई। जिस पेपर कटिंग सांझी की कृति जो बाइडन को दी गई, उसे मथुरा में तैयार किया गया। जिस परिवार में ये कटिंग तैयार हुई, वहां छह पीढ़ियों से इस लोक परंपरा को सहेजा और संवारा जा रहा है। कभी सीखने तक सीमित रही ये परंपरा अब प्रोफेशन में बदल गई है।

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    इस तरह परिवार में बढ़ी कला

    मथुरा शहर के कंसखार मुहल्ले में रहने वाले आशुतोष वर्मा सांझी की परंपरा से जुड़े ऐसे ही परिवार की छठी पीढ़ी में शामिल हैं। बीए आनर की पढ़ाई करने वाले आशुतोष को ये कला विरासत में मिली है। किसी भी कृति को देख उसकी पेपर पर पेंसिल से तस्वीर उकेर और कैंची से काटकर अपनी कृति तैयार करते हैं। आशुतोष बताते हैं कि सांझी बनाने की परंपरा उनके परिवार में गीलूराम वर्मा जी ने शुरू की थी। वह मंदिरों में फूल बंगले पर फूलों से आकृतियां बनाते थे।

    ये भी एक तरह की सांझी थी, लेकिन उन्होंने इसे प्रोफेशनल रूप नहीं दिया। उनसे इस कला को बेटे भैंरो प्रसाद वर्मा ने सीखा और फिर उनके बेटे नारायण दास ने। नारायण दास वर्मा ने इस परंपरा को प्रोफेशनल रूप दिया। आशुतोष बताते हैं कि उनके परबाबा नारायण दास ने इस कला का प्रदर्शन देश के विभिन्न हिस्सों में किया, उन्हें 1980 में राजकीय अवार्ड भी मिला। नारायण दास ये प्रतिभा उनके बेटे चैनसुख दास ने सीखी और चैनसुख दास से उनके बेटे विजय, अजय और मोहन ने। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन को सांझी की जो कृति भेंट की गई है, वह चैनसुख दास के हाथों से बनी थी।

    सांझी आर्टिस्ट आशुतोष वर्मा। 

    चाचा, ताऊ की सीख को जीवन में उतारा

    आशुतोष वर्मा की उम्र महज अभी 25 बरस है। वह बताते हैं कि 13 साल की उम्र में पिता को पैरालिसिस का अटैक पड़ गया। फिर पढ़ाई के साथ चाचा मोहन और ताऊ विजय कुमार से उन्होंने सांझी पेपर कटिंग सीखी।

    मिल चुके हैं कई अवार्ड

    12 साल के करियर में आशुतोष दिल्ली, चेन्नई, मुंबई समेत कई आधा सैकड़ा से अधिक प्रदर्शनियों में इस कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। उन्हें 2019 में मुंबई में रोशन कलापेसी अवार्ड भी मिला। वह कहते हैं कि उनके पास सांझी की कृति सौ रुपये से लेकर पांच लाख रुपये तक की कलाकृति मौजूद हैं। वह कहते हैं कि ऐसी कृतियों को लोक पसंद करते हैं। इनमें राधा-कृष्ण की लीलाओं के साथ ही विभिन्न आकृतियां पहले पेंसिल से बनाई जाती हैं और फिर उनकी कटिंग की जाती है।

    इसके बाद उन्हें फ्रेम आदि में सेट किया जाता है। इससे पहले ताऊ विजय कुमार वर्मा को राजकीय अवार्ड 1985 और 1996, 97 में राजकीय अवार्ड मिला। इसके बाद 1985 में ही विजय कुमार को सूरजकुंड का कलामणि अवार्ड मिला। छोटे भाई मोहन कुमार 2011 में राजकीय अवार्ड मिला। यूनेस्को अवार्ड और नेशनल अवार्ड 2018 में मिला।