आगरा, तनु गुप्ता। महानवमी के दिन मां दुर्गा के सिद्धिदात्री स्वरूप की पूजा करते हैं। महानवमी को मां सिद्धिदात्री की पूजा करने से सभी प्रकार के भय, रोग और शोक का समापन हो जाता है। महानवमी के दिन कन्या पूजन और नवरात्रि हवन का भी विधान है। नवरात्रि के नौवें यानि आखिरी दिन मां भगवती के नौवें स्वरूप देवी सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना का विधान है। मां सिद्धिदात्री अपने भक्तों को सभी प्रकार की शक्तियां प्रदान करती हैं। माता का यह स्वरूप सभी दिव्य आकांक्षाओं को पूर्ण करने वाला है। धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार इस दिन विधि विधान से मां सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की पूजा कर सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त किया था। माता की अनुकम्पा से भोलेनाथ का आधा शरीर देवी का हुआ था, इसी कारण वह इस लोक में अर्धनारीश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए थे।

मां सिद्धिदात्री की पूजा का महत्त्व

शास्त्रों के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व नामक आठ सिद्धियां हैं। ये सभी सिद्धियां मां सिद्धिदात्री की आराधना से प्राप्त की जा सकती हैं। हनुमान चालीसा में भी अष्टसिद्धि नव निधि के दाता कहा गया है।

कैसे देवी का नाम पड़ा सिद्धिदात्री

माता सिद्धिदात्री के नाम से ही पता चलता है कि वह सभी सिद्धियों का देने वाली हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ब्रह्माण्ड के प्रारंभ में भगवान रूद्र ने देवी आदि पराशक्ति की आराधना की। ऐसी मान्यता है कि देवी आदि पराशक्ति का कोई स्वरूप नहीं था। शक्ति की सर्वशक्तिमान देवी आदि पराशक्ति सिद्धिदात्री स्वरूप में भगवान शिव के शरीर के बाएं भाग पर प्रकट हुईं।

मां सिद्धिदात्री की पौराणिक कथा

वौदिक शास्त्र के अनुसार भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री की पूजा कर सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त किया था। तथा उनका आधा शरीर नारी का हो गया थाए इसलिए उन्हें अर्धनारेश्वर के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब पूरे ब्रम्हांड में अंधेरा था यानि कोई संकेत नहीं था तब उस अंधकार से भरे ब्रह्मांड में ऊर्जा का एक छोटा सा किरण प्रकट हुआ। धीरे धीरे इस किरण ने अपना बड़ा आकार लेना शुरु किया और अंत में इसने एक दिव्य नारी का रूप धारण किया। यह कोई और नहीं बल्कि स्वंय मां सिद्धिदात्री थी। मां सिद्धिदात्री ने प्रकट होकर त्रिदेवों को जन्म दिया तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश प्रकट हुए। मान्यता है कि माता ने सृष्टि का निर्माण किया था।

मां सिद्धिदात्री की पूजन सामग्री

लाल चुनरी, लाल वस्त्र, मौली, श्रृंगार का सामान, दीपक, घी, तेल, धूप, नारियल, साफ चावल, कुमकुम, फूल, देवी की प्रतिमा या फोटो, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, बताशे या मिसरी, कपूर, फल मिठाई।

मां सिद्धिदात्री पूजा विधि

सर्व प्रथम चौकी पर मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद आरती की करें। आरती के बाद हवन करें। हवन करते समय साधक को सभी देवी.देवताओं को याद करना चाहिए। सभी देवी देवताओं के नाम की हवनकुण्ड में आहुति दें। फिर मां सिद्धिदात्री का ध्यान लगाएं। मां सिद्धिदात्री से हाथ जोड़कर सुख शांति के लिए प्रार्थना करें और दुर्गा सप्तशती के सभी श्लोक मंत्रों के साथ आहुति दें। शक्ति मंत्र उं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे नमो नमरू का उच्चारण करते हुए 108 बार हवनकुण्ड में आहुति दें। 108 आहुति के बाद पूर्ण आहुति दें। इसके बाद नवग्रह शांति के लिए प्रार्थना करें और हवनकुण्ड के चारों तरफ जल अर्पित करें। भगवान शिव और ब्रह्मा जी को स्मरण करें। इसके बाद मां को प्रसाद का भोग लगाएं और स्त्रोत पाठ करें।

Edited By: Tanu Gupta

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