हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेषः कमलेश्वर, बाकी है नाम, निशां गुमनाम, मैनपुरी ने भुला दिया अपने सितारे को
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेषः पत्रकारिता और साहित्य के सितारा बने अपने लाल को भूल गई मैनपुरी। साहित्यकार के नाम पर नहीं होता कोई आयोजन युवा पीढ़ी अनजान। कमलेश्वर का नाम पत्रकारिता साहित्य क्षेत्र से लेकर सिनेमा जगत तक में अब भी कायम हैं।

आगरा, दिलीप शर्मा। साहित्य और पत्रकारिता के आकाश पर सितारा बनकर चमकने वाले अपने लाल को मैनपुरी ने ही भुला दिया है। जिन कमलेश्वर का नाम पत्रकारिता, साहित्य क्षेत्र से लेकर सिनेमा जगत तक में अब भी कायम हैं, उन्हीं के जन्म और बचपन के दिनों के निशां गुमनाम हो चुके हैं। जिन गलियों में खेलते हुए उन्होंने अपने लेखन की शुरुआत की, वहां उनका नाम भी ज्यादातर लोग नहीं जानते।
देश के प्रख्यात साहित्यकारों में शुमार कमलेश्वर का जन्म मैनपुरी के कटरा मुहल्ला में छह जनवरी, 1932 को हुआ था। हाईस्कूल तक यहीं रहकर पढ़ाई की। उन्होंने “राजा निरबंशिया” कहानी यहीं लिखी थी। फिर पढ़ाई के लिए इलाहाबाद (अब प्रयागराज) चले गए, वहां हिंदी साहित्य में एमए किया। इसके बाद कहानी, उपन्यास, पत्रकारिता, स्तंभ, फिल्म पटकथा जैसी अनेक विधाओं में उन्होंने अपनी लेखनी का लोहा मनवाया। 27 जनवरी, 2007 को उनका निधन हुआ था।
साहित्यकार डा. शिवजी श्रीवास्तव बताते हैं के कमलेश्वर को मैनपुरी से गहरा लगाव था। यहां दो बार नुमाइश के आयोजन में उनको सम्मानित किया गया। कमलेश्वर यहां एक संग्रहालय बनवाना चाहते थे। परंतु मैनपुरी में उनके नाम की याद दिलाने वाला न तो कोई स्थल है और न ही कोई आयोजन। युवा पीढ़ी को तो यह तक नहीं पता कि कमलेश्वर का जन्म मैनपुरी में ही हुआ था।
पत्रकारिता का सफर
कमलेश्वर ने कई हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में जिम्मेदारी निभाई। विहान, नई कहानियां, सारिका, कथा यात्रा, गंगा आदि पत्रिकाओं में संपादक रहे। उन्होंने हिंदी के प्रतिष्ठित दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में भी संपादक के तौर पर योगदान दिया। दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक जैसा महत्वपूर्ण दायित्व भी निभाया।
प्रमुख पड़ाव
कमलेश्वर को वर्ष 1995 में पद्मभूषण मिला था। वर्ष 2003 में उपन्यास “कितने पाकिस्तान” के लिए उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। कमलेश्वर ने 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह और करीब 100 फिल्मों की पटकथा लिखीं। इनमें मिस्टर नटवरलाल, सौतन, राम-बलराम, आंधी जैसी फिल्में भी शामिल हैं। टीवी सीरियल चन्द्रकांता, दर्पण और एक कहानी जैसे धारावाहिकों के पटकथा लेखक भी कमलेश्वर ही थे।
ये लिखे उपन्यास
- एक सड़क सत्तावन गलियां
- लौटे हुए मुसाफिर
- वही बात
- समुद्र में खोया हुआ आदमी
- एक और चंद्रकांता
- कितने पाकिस्तान
- तीसरा आदमी
- सुबह...दोपहर...शाम
- डाक बंगला, काली आंधी
- आगामी अतीत
- रेगिस्तान
- अंतिम सफर
मैनपुरी में कमलेश्वर के नाम से बड़ा आयोजन होना चाहिए। युवा पीढ़ी को पता ही नहीं कि वह यहीं के थे।
-श्रीकृष्ण मिश्रा एडवोकेट, साहित्यकार मैनपुरी
शहर की प्रमुख सड़क या किसी स्थल का नाम कमलेश्वर के नाम पर रखा जाना चाहिए। इसके लिए पूर्व में प्रयास हुए थे।
संजय दुबे, एडवोकेट, साहित्यप्रेमी
कमेंट्स
सभी कमेंट्स (0)
बातचीत में शामिल हों
कृपया धैर्य रखें।