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    शिव का मनभावन सावन, जानिए क्‍यों है अति पावन और क्‍या है शिव तत्‍व का रहस्‍य Agra News

    By Tanu GuptaEdited By:
    Updated: Wed, 17 Jul 2019 05:46 PM (IST)

    शिव की आराधना जितनी सहज और सरल है उतना ही गूढ़ है शिव तत्‍व। धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार शिव का पूर्ण रूप ही अथाह रहस्‍यों से परिपूर्ण है।

    शिव का मनभावन सावन, जानिए क्‍यों है अति पावन और क्‍या है शिव तत्‍व का रहस्‍य Agra News

    आगरा, तनु गुप्‍ता। सनातन धर्म में शिव का प्रमुख स्थान है। शिव: कल्याणकार:। शिव को तमोगुण प्रधान यानि प्रलयंकारी भी माना गया है। शिव निरंतर विभूति को अपने शरीर पर लपेटते हैं। शिव जी कंठ में माला के समान सर्प को धारण करते हैं। सावन माह को विशेष रूप से भगवान शिव को ही समर्पित किया गया है। थोड़ी अर्चना और पूर्ण आस्‍था के साथ यदि भगवान भोलेनाथ की आराधना की जाए तो साधना सफल हो ही जाती है। शिव की आराधना जितनी सहज और सरल है उतना ही गूढ़ है शिव तत्‍व। धर्म वैज्ञानिक पंडित वैभव जोशी के अनुसार शिव का पूर्ण रूप ही अथाह रहस्‍यों से परिपूर्ण है। 

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    शिव जी के तीन नेत्र हैं। उनकी जटाओं में गंगा और मुकुट में चन्द्रमा निवास करते हैं। उनके हाथ में डमरू तथा त्रिशूल सुशोभित है। त्रिशूल सत्व, रज, तमद्धगुणों का प्रतीक है। शिव व्याघ्र चर्म को वस्त्र की तरह धारण करते हैं। शिव को पंचानन भी कहा जाता है। उनके अनेक रुप हैं। वे विभिन्न नए रुपों एवं नामों से जाने जाते हैं। सामान्य रुप से शिव जी को लिंग के रुप में मंदिरों में स्थापित किया गया है। शिव की प्रतिमा प्राय: ध्यान मुद्रा अथवा ताण्डव नृत्य के रुप में देखी जाती है। वस्तुत: शिव का अर्थ है शुभ, मंगलमय। शास्त्रों में शिव शब्द का प्रयोग अन्य देवी देवताओं के लिए भी किया गया है। 

    शिव की विष्‍णु साधना 

    पंडित वैभव कहते हैं कि शंकर जी को जप करते देख पार्वती को आश्चर्य हुआ कि देवों के देव, महादेव भला किसका जप कर रहे हैं। पूछने पर महादेव ने कहा,' विष्णुसहस्त्रनाम का।' पार्वती ने कहा , इन हजार नामों को साधारण मनुष्य भला कैसे जपेंगे? कोई एक नाम बनाइए, जो इन सहस्त्र नामों के बराबर हो और जपा जा सके। महादेव ने कहा- राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे, सहस्त्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने। यानी राम- नाम सहस्त्र नामों के बराबर है। भगवान शिव , विष्णु , ब्रह्मा , शक्ति , राम और कृष्ण सब एक ही हैं। केवल नाम रूप का भेद है, तत्व में कोई अंतर नहीं। किसी भी नाम से उस परमात्मा की आराधना की जाए, वह उसी सच्चिदानन्द की उपासना है। इस तत्व को न जानने के कारण भक्तों में आपसी मतभेद हो जाता है।

    नाम रूप को बनाएं इष्‍ट

    पंडित वैभव के अनुसार परमात्मा के किसी एक नाम रूप को अपना इष्ट मानकर, एकाग्रचित्त होकर उनकी भक्ति करते हुए अन्य देवों का उचित सम्मान व उनमें पूर्ण श्रद्धा रखनी चाहिए। किसी भी अन्य देव की उपेक्षा करना या उनके प्रति उदासीन रहना स्वयं अपने इष्टदेव से उदासीन रहने के समान है। शिव पुराण में कहा गया है कि ब्रह्मा , विष्णु व शिव एक-दूसरे से उत्पन्न हुए हैं। एक-दूसरे को धारण करते हैं। एक-दूसरे के अनुकूल रहते हैं। भक्त सोच में पड़ जाते हैं। कहीं किसी को ऊंचा बताया जाता है, तो कहीं किसी को। विष्णु शिव से कहते हैं, ' मेरे दर्शन का जो फल है वही आपके दर्शन का है। आप मेरे हृदय में रहते हैं और मैं आपके हृदय में रहता हूं।' कृष्ण, शिव से कहते हैं, ' मुझे आपसे बढ़कर कोई प्यारा नहीं है, आप मुझे अपनी आत्मा से भी अधिक प्रिय हैं।'

    त्रिनेत्र शक्ति चलाती है संसार

    संसार में निरंतर तीन प्रकार के कार्य चलते रहते हैं- उत्पत्ति, पालन और संहार। इन्हीं तीन भिन्न कार्यों के लिए तीन नाम दे दिए गए हैं- ब्रह्मा, विष्णु व महेश। विष्णु सतमूर्ति हैं। ब्रह्मा रजोगुणी मूर्ति व शिव तामसमूर्ति हैं। एक-दूसरे से स्नेह के कारण एक- दूसरे का ध्यान करने से शिव गोरे हो गए और विष्णु का रंग काला हो गया।

    शिव को नहीं चाहिए सुदीर्घ भक्ति

    शिव तामसी गुणों के अधिष्ठाता हैं। तामसी गुण यानी निंदा, क्रोध, मृत्यु, अंधकार आदि। तामसी भोजन यानी कड़वा, विषैला आदि। जिस अपवित्रता से, जिस दोष के कारण किसी वस्तु से घृणा की जाती है, शिव उसकी ओर बिना ध्यान दिए उसे धारण कर उसे भी शुभ बना देते हैं। समुद्र मंथन के समय निकले विष को धारण कर वे नीलकंठ कहलाए। मंथन से निकले अन्य रत्नों की ओर उन्होंने देखा तक नहीं। जिससे जीव की मृत्यु होती है, वे उसे भी जय कर लेते हैं। तभी तो उनका नाम मृत्य़ु़ंजय है। क्रोध उनमें है पर वे केवल जगत कल्याण के लिए उसका प्रयोग करते हैं, जैसे कामदेव का संहार। उन्हें घोर तपस्या या सुदीर्घ भक्ति नहीं चाहिए। थोड़ी सी भक्ति से ही वे प्रसन्न हो जाते हैं।

    ऐश्‍वर्य रहित है शिव की पूजा 

    पंडित वैभव जोशी के अनुसार वे शव की राख अपने ऊपर लगाते हैं और श्मशान में निवास करते हैं। वे जीव को जीवन की अनित्यता की शिक्षा देते हैं। उनके जीवन में वैराग्य है। त्याग है। इसी कारण उनकी पूजा में ऐश्वर्य की वस्तुओं का प्रयोग नहीं होता। हर उस चीज से उनकी पूजा होती है जिन्हें आमतौर पर कोई पसंद नहीं करता। शिव के उपासक को शिव की ही तरह वैरागी होना चाहिए। वे अपनी ही बरात में बैल पर चढ़कर, बाघंबर ओढ़ कर चल दिए क्योंकि उन्हें किसी तरह के भौतिक ऐश्वर्य से मोह नहीं है। वे आशुतोष हैं। जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं।भोलेनाथ हैं पर इसका यह मतलब नहीं कि वे बुद्धि का प्रयोग नहीं करते। बुद्धि की उत्पत्ति का स्थान भगवान शिव ही हैं। शिव दरिद्र की तरह रहते हैं क्योंकि वे सूचित करते हैं कि वैराग्य सुख से बढ़कर कोई सुख नहीं। सत्व, रज और तम, तीनों गुणों की महत्ता आवश्यक है। उत्पत्ति के बाद जीव अपने और दूसरों के पालन-पोषण के लिए काम करता हुआ इतना थक जाता है कि सब कुछ छोड़कर निंद्रा यानी तम में लीन होना चाहता है। व्याकुल व्यक्ति को विश्राम की आवश्यकता होती है , ऐसे ही पाप बढ़ जाने पर ईश्वर विश्राम देने के लिए विश्व का संहार करते हैं। तम ही मृत्यु है। तम ही काल है इसीलिए वे महामृत्युंजय हैं। महाकालेश्वर हैं। वे विष और शेषनाग को गले में धारण कर लेते हैं। पर नाश केवल शरीर का होता है। जीवात्मा तो परमात्मा में मिल जाती है। जीवात्मा को मुक्त करती श्रीगंगा भी उन्होंने अपनी जटा में धारण कर ली है। वे संहार करते हैं तो मुक्ति भी देते हैं। बिना विश्राम के, बिना संहार के न उत्पत्ति हो सकती है और न ही पालन की क्रिया।