कलम के जादूगर रांगेय राघव
रांगेय राघव बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होने 14 वर्ष की उम्र मे सन् 1937 से लेखन कार्य शुरू कर दिया था। जब वे आगरा मे 11वी कक्षा मे अध्ययन कर रहे थे, तब उनका पहला उपन्यास घरोदा आया।
जयंती पर विशेष
¨हदी साहित्य का एक दीपक, जिसका जीवन ही 39 साल का रहा। लेकिन इस शख्सियत ने अल्पायु मे ही साहित्यक जगत मे एक से बढ़कर एक बुलंदियां हासिल कीं। उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार,आलोचक, नाटककार, कवि और इतिहासवेलाा आदि के रूप मे पहचान कायम करने वाले रांगेय राघव ताजनगरी के उन चुनिंदा साहित्यकारो मे एक रहे, जिन्होने विश्वभर मे अपनी कलम की धाक जमायी। उनके बारे मे विस्तार से बताती नेहा सिंह की रिपोर्ट-
14 वर्ष की उम्र मे शुरू किया लेखन
रांगेय राघव बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होने 14 वर्ष की उम्र मे सन् 1937 से लेखन कार्य शुरू कर दिया था। जब वे आगरा मे 11वी कक्षा मे अध्ययन कर रहे थे, तब उनका पहला उपन्यास घरोदा आया। वे जीवन के अंतिम समय तक लिखते रहे और जीवन के 39 वर्षाे मे लगभग 150 पुस्तको का सृजन किया।
दोस्तो मे थे पप्पू नाम से लोकप्रिय
रांगेय राघव का जन्म 17 जनवरी 1923 को आगरा मे हुआ था। उनके स्कूल कॉलेज का नाम टीएनवी आचार्य (तिरुमल्लै नबकम वीर राघव आचार्य ) था। मगर वे घर और मित्रो मे पप्पू नाम से लोकप्रिय थे। रांगेय राघव के घर मे या तो तमिल बोली जाती थी या शुद्ध ब्रजभाषा। उन्होने अपने संपूर्ण साहित्य मे अपना रोना नही रोया बल्कि दूसरो के दुख दर्द को ही अभिव्यक्त किया।
नाराज हो कर नही गए थे पीएचडी डिग्री लेने
रांगेय ने आगरा विश्व विद्यालय से ¨हदी मे एमए और गुरु गोरखनाथ और उनका युग विषय पर पीएचडी की। दिन रात एक करके शोध प्रबंध पूरा किया। परंतु उपाधि मिलने का समय आने पर दीक्षांत समारोह से एक दिन पूर्व अपने गांव चले गए। उन्होने देखा कि अन्य लोग घर बैठे ही थीसिस लिख कर डिग्री प्राप्त कर लेते है। लिहाजा वह अपनी पीएचडी डिग्री नहीं लेने गए।
बहुमुखी प्रतिभा के थे धनी
कहानी, उपन्यास, काव्य, इतिहास और समाज शास्त्र आदि सभी क्षेत्रो मे रांगेय राघव की बहुमुखी प्रतिभा के दर्शन होते है। वे एक अच्छे चित्रकार भी थे। उनका कालिदास के मेघदूत का पद्दानुवाद अब तक के सभी अनुवादो मे श्रेष्ठ माना गया है। समाज शास्त्र पर भी उनकी कई महत्वपूर्ण पुस्तके प्रकाशित हुई है। रांगेय बेहद अध्ययनशील व्यक्ति थे। दिन मे चिलचिलाती धूप मे घंटो गरीबो के बीच बिताते।
लिखने की पद्धति थी बड़ी विचित्र
रांगेय राघव मेरे घनिष्ठ मित्रो मे थे। रांगेय की लिखने की पद्धति विचित्र थी। वे पहले ही पृष्ठो पर ऊपर संख्या लिख लिया करते थे और उनकी कहानी या उपन्यास उतने ही पृष्ठो पर समाप्त होता था। उनके लिखने का समय रात 10 बजे से ढाई-तीन बजे तक का होता था। मित्र और पड़ोसी होने के नाते अक्सर ही सुबह मै उनके पास पहंुच जाया करता था। वे रात को लिखे हुए को मुझे सुना कर मेरी राय पूछा करते थे। वे सस्ते प्रचार से बहुत दूर रहते थे। इसलिए वे सभा सम्मेलनो मे बहुत कम जाया करते थे। उनका मानना था कि अच्छा साहित्य हमेशा हीरे की तरह चमकता है। वे कहते थे कि मैने खून पसीना बहाकर लिखा है खेल नही किया।
प्रणवीर चौहान, वरिष्ठ साहित्यकार
गोकुलपुरा मे जुटते सभी
जब मै इंटर मे पढ़ता था तब रागेय राघव से मेरी पहली मुलाकात हुई थी। वे आगरा कॉलेज मे आए थे। उनके गंभीर ढंग से बोलने के तरीके ने मुझे काफी प्रभावित किया। सन् 1963 के दौरान आगरा कॉलेज के प्रोफेसर डॉ. घनश्याम अस्थाना के गोकुलपुरा स्थित निवास स्थान पर उनका रोज आना जाना होता था। राघवजी के अलावा डॉ. राम विलास शर्मा, कहानीकार पंडित राजेद्र यादव आदि जुटा करते थे। मै भी उस मंडली मे शामिल होता था। वहां बैठकर नई किताबो पर विचार विमर्श किया जाता था।
सोम ठाकुर, अंतरराष्ट्रीय कवि
कालजयी साहित्यकार थे राघवजी
रागेय राघव मेरे युग से पहले के साहित्यकार है कितु वे उन साहित्यकारो मे है जिन्हे कालजयी कहा जाता है। 'कब तक पुकारू' को मैने सभवत 30 वर्ष पूर्व पढ़ा था लेकिन उसका एक-एक दृश्य अब भी स्मृति पटल पर अकित है। बाद मे इस पर निर्मित धारावाहिक भी बेहद लोकप्रिय हुआ। उनके बराबर जनजातियो और अभिजात्य वर्ग के विडबना पूर्ण सबधो का ऐसा चित्रण किसी ने नही किया। मुर्दों का टीला भी अद्भुत उपन्यास है। मोहन जोदड़ो की सभ्यता और सस्कृति के जीवत चित्रण के लिए ये हमेशा याद किया जाएगा।
सुशील सरित, साहित्यकार
एक परिचय: रांगेय राघव
जन्म-17 जनवरी, 1923
पूरा नाम-तिरुमल्लै नंबकम वीर राघव आचार्य कमक्षेत्र-कवि, आलोचक, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार और अनुवादक।
पुरस्कार/उपाधि: ¨हदुस्तानी अकादमी पुरस्कार
-डालमिया पुरस्कार उप्र शासन पुरस्कार
-राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार
39 वर्ष की आयु मे की 150 कृतियो की रचना कर दी
14 वर्ष की आयु मे शुरू कर दिया था लेखन कार्य
11 वी की पढ़ाई के दौरान आ गया था पहला उपान्यास
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