Trending

    Move to Jagran APP
    pixelcheck
    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    मुगल काल का गूगल मैप हैं कोस मीनार, आगरा में आज भी बची हैं आठ मीनार

    By Tanu GuptaEdited By:
    Updated: Wed, 30 Dec 2020 06:11 PM (IST)

    शेरशाह सूरी ने रोड के किनारे कराया था निर्माण। कोस मीनारों के नजदीक बनाई जाती थीं सराय और कुआं। राहगीरों का करती थीं मार्ग प्रशस्त। सूचनाओं को भेजने का माध्यम भी थीं कोस मीनार। जहांगीर ने किया था पक्की ईंटों व पत्थरों से बनाने का आदेश।

    Hero Image
    मुगल काल में गूगल मैप का काम कोस मीनार किया करती थीं।

    आगरा, जागरण संवाददाता। आज हम कहीं घूमने जाते हैं तो गूगल मैप का सहारा लेते हैं। ना केवल उससे रास्ता तलाशते हैं, बल्कि होटल, रेस्टोरेंट आदि भी उसके सहारे ढूंढ़ते हैं। मुगल काल में गूगल मैप का काम कोस मीनार किया करती थीं। यह ना केवल राहगीरों की राह प्रशस्त किया करती थीं, बल्कि उनके नजदीक सराय और कुआं होने से राहगीरों काे आश्रय भी मिल जाया करता था। सूचनाओं के आदान-प्रदान में भी इनका इस्तेमाल होता था।

    विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

    शेरशाह सूरी ने वर्ष 1540-45 तक शासन किया था। उसने ग्रांड ट्रंक रोड के किनारे कोस मीनार और सराय बनवाई थीं। शेरशाह सूरी ने हर दो कोस की दूरी पर कोस मीनार का निर्माण कराया था। उसके बेटे इस्लाम शाह सूरी ने प्रत्येक कोस मीनाार के बीच में सराय बनवाई थीं। करीब 30 फुट ऊंची कोस मीनारों को लाखौरी ईंंटों और चूने से बनाया गया था। इनके ऊपर चूने का मोटा प्लास्टर किया गया था। इन्हीं मीनारों को देखकर सैनिक काफिले व राहगीर यात्रा करते थे। प्राचीन समय में डाक सिस्टम भी इन्हीं मीनारों की तर्ज पर चलता था। जहांगीर ने कोस मीनारों को पक्की ईंटों और पत्थरों से बनवाने का आदेश किया था। उसने लाहौर से आगरा तक मार्ग में पड़ने वाली नदियों, नहरों, जलाशयों के ऊपर पुल भी बनवाए थे। वर्ष 1830 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने वाणिज्यिक और प्रशासनिक दृष्टि से इसकी मरम्मत कराई थी। समय के साथ इन कोस मीनारों को भुला दिया गया। अधिकांश मीनारों का अस्तित्व ही मिट चुका है। आगरा में केवल आठ कोस मीनार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) द्वारा संरक्षित हैं। इनमें से पांच आगरा-फतेहपुर सीकरी मार्ग और तीन आगरा-मथुरा मार्ग पर स्थित हैं। आगरा-मथुरा रोड पर मरियम टाम्ब से आगे स्थित कोस मीनार के पास प्राचीन सराय के अवशेष आज भी नजर आते हैं।

    जीटी रोड

    यह एशिया के प्राचीनतम मार्गों में से एक है। ईसा से तीन शताब्दी पूर्व मौर्य सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के समय से इसे उत्तरपथ के नाम से जाना जाता था। अशोक महान के समय इसका विस्तार हुआ। उत्तरपथ के बाद इसे सड़क-ए-आजम, बादशाही सड़क, सड़क-ए-शेरशाह के नाम से जाना गया। पूर्व में यह बांग्लादेश के टेकनाफ से पश्चिम में अफगानिस्तान के काबुल तक है।

    दूरी मापने का पैमाना था कोस

    कोस दूरी मापने का पैमाना है। यह दो मील या सवा तीन किमी के बराबर होता है। उस समय किमी प्रचलन में नहीं था और कोस में दूरी मापी जाती थी।

    आगरा में यहां हैं कोस मीनार

    -आगरा-फतेहपुर सीकरी मार्ग, मील 9, फर्लांग 4

    -आगरा-फतेहपुर सीकरी मार्ग, मील 11, फर्लांग 1

    -आगरा-फतेहपुर सीकरी मार्ग, मील 12, फर्लांग 7

    -आगरा-फतेहपुर सीकरी मार्ग, मील 15, फर्लांग 2

    -आगरा-फतेहपुर सीकरी मार्ग, मील 4, फर्लांग 3

    -आगरा-मथुरा मार्ग, मील 6, फर्लांग 7

    -आगरा-मथुरा मार्ग, मील 9, फर्लांग 4

    -आगरा-मथुरा मार्ग, मील 126, फर्लांग