आगरा, योगेश जादौन। बापू को गुजरे 74 साल हो गए। आगरा शहर में अंतिम बार आए तो उन्हें 84 से अधिक साल हो गए। इतना लंबा अंतराल कि तब उन्हें देखने और सुनने वाला अब शायद ही हो। जिन्होंने उन्हें देखा और सुना उनकी दूसरी पीढ़ी में भी कम ही लोग हैं। ऐसे में बापू की याद कहां दर्ज होंगी। शायद उन जगहों, उन मैदानों में जहां उनके कदम पड़े। उन इमारतों में जहां वह रुके। या फिर पुलिस की उस बैरक में जहां उन्हें एक रात के लिए रखा गया।

एडीए ने डाला यादाें पर ताला

बापू, यानी मोहनदास करमचंद गांधी। पते की यह छोटी सी पोटली लेकर तलाश को निकला हूं। एत्माद्दौला के पास यमुना किनारे गांधी स्मारक और संग्रहालय। बापू यहां स्वास्थ्य लाभ को 11 दिन रुके थे। बापू की यादें यहां एडीए के ताले में बंद हैं। चाबी किसी यादव जी के पास हैं। यादव जी कहां मिलेंगे, जवाब मौन है। ये भवन अब निराश करता है। बापू की यादों का यहां कोई चिह्न नहीं है।

अंतिम बार बापू 1938 में आगरा आए। तब कहां गए, किससे मिले, किसी को नहीं पता। तब फिर बापू कहां मिलेंगे। शायद मथुरा, इस शहर में वे करीब पांच बार आए। दक्षिण अफ्रीका से लौटकर वे वृंदावन आए थे। महान क्रांतिकारी राजा महेंद्र प्रताप के प्रेम महाविद्यालय और रामकृष्ण आश्रम गए। मगर, आज उनकी यादें खोजे पर भी नहीं मिलतीं। उस प्रेम महाविद्यालय में भी नहीं, जिसे उन्होंने अंग्रेजी ताले से मुक्त कराया था।

पलवल से गिरफ्तार कर लाए मथुरा 

दूसरी बार, पलवल से गिरफ्तार कर अंग्रेजी सरकार की पुलिस उन्हें एक रात के लिए पुलिस बैरक में लेकर आई। बापू कि वह बैरक कहां है, इसका कोई निशान नहीं है। तीसरी बार बापू कांग्रेस के दिल्ली प्रांत के अधिवेशन को संबोधित करने आए। समाजसेवी शिवदत्त चतुर्वेदी बताते हैं, आज जहां नानक नगर है बापू ने वहां सभा की। मगर कहां, कोई चिह्न नहीं।

मथुरा में की थी सभा

मथुरा के वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद अशोक बंसल कहते हैं, बस कुछ किताबों में ही इसका जिक्र मिलता है। पुराने शहर में एक गांधी पार्क भी है, कहते हैं यहां भी सभा की। आज यहां बापू की एक मूर्ति लगी है। मगर यहां कब सभा की, उसका जिक्र तो चिंतामणि शुक्ल की उस किताब में भी नहीं है, जिसमें मथुरा का राजनीतिक इतिहास दर्ज है। बापू एक बार फिर प्रेम महाविद्यालय के प्राचार्य गिडवानी के आमंत्रण पर राजा महेंद्र प्रताप के चित्र के अनावरण को आए। मगर, आज वह चित्र भी नहीं मिलता है।

इमारत में अब फर्नीचर की दुकान

प्रेम महाविद्यालय के जयप्रकाश कहते हैं, बस कुछ दस्तावेज में ही इसका जिक्र है। प्रेम महाविद्यालय तक में बापू की मूर्ति नहीं है। बापू अंतिम बार 1929 में आए। दो दिन मथुरा में प्रवास किया। रंगेश्वर स्थित सुख संचारक कंपनी की इमारत (पुराना डाकघर) में ठहरे। इस इमारत में आज फर्नीचर की दुकान चल रही है। बापू आज मैनपुरी के क्रिश्चियन कालेज और फिरोजाबाद के उस रामलीला मैदान में भी नहीं हैं, जहां उन्होंने सभा की। फिर कहां मिलेंगे बापू। क्या, उन संदेशों में, उन विचारों में जो अब दिवस विशेष की चर्चा का हिस्सा मात्र बनकर रह गया है।

कहां, कब आए महात्मा

आगरा

1929: यमुना किनारे 11 दिन स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रवास किया

1938: दूसरी बार शहर में आए

मथुरा

14 अप्रैल 1915: दक्षिण अफ्रीका से लौटकर वृंदावन के प्रेम महाविद्यालय पहुंचे

1991: पलवल से गिरफ्तार कर मथुरा लाया गया

1921: दिल्ली कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन में

1927: दोबारा प्रेम महाविद्यालय पहुंचे

1929: खादी प्रचार यात्रा पर दो दिन के लिए आए

फिरोजाबाद

1929: रामलीला मैदान में सभा को संबोधित किया

मैनपुरी

1929: क्रिश्चियन कालेज मैदान में सभा की 

Edited By: Prateek Gupta

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